संपादकीय
08 Jun, 2026

तमिलनाडु की सियासत में 'सिंगम' का नया दांव: अन्नामलाई का 'वी द लीडर्स' क्या भाजपा और द्रविड़ दलों को देगा मात?

के. अन्नामलाई द्वारा भाजपा से इस्तीफा देकर ‘वी द लीडर्स’ आंदोलन शुरू करने से तमिलनाडु की राजनीति में त्रिकोणीय संघर्ष की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।

चेन्नई, 08 जून।

तमिलनाडु की राजनीति में शुक्रवार, 06 जून 2026 को भूचाल आ गया, जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई का इस्तीफा मंजूर कर लिया। इसके साथ ही अन्नामलाई ने ‘वी द लीडर्स’ नाम से नया आंदोलन शुरू करने का ऐलान कर दिया। उनका दावा है कि यह आंदोलन भविष्य में राजनीतिक दल बनेगा और अगले विधानसभा चुनाव में ताल ठोकेगा। इस्तीफे के कुछ ही घंटों में 7 लाख से ज्यादा लोग ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इससे जुड़ गए। अन्नामलाई के साथ उपाध्यक्ष करुणा नागराजन और सचिव सुमति वेंकटेश ने भी भाजपा छोड़ दी। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन ने भले कहा कि भाजपा को कोई नुकसान नहीं होगा, परंतु दक्षिण भारत की राजनीति के जानकार इसे साधारण बगावत नहीं मान रहे। यह उप-राष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद के बीच नया ‘सेंटर-राइट’ स्पेस बनाने की कोशिश है, जहां 1967 के बाद द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बाहर तीसरी ताकत कभी स्थायी रूप से नहीं बन पाई।

भाजपा छोड़कर दल बनाने वाले अन्नामलाई अकेले नहीं हैं। कल्याण सिंह ने 1999 में राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई, उमा भारती ने 2005 में भारतीय जनशक्ति पार्टी, बी.एस. येदियुरप्पा ने 2012 में कर्नाटक जनता पक्ष, बाबूलाल मरांडी ने 2006 में झारखंड विकास मोर्चा, शंकर सिंह वाघेला ने 1996 में राष्ट्रीय जनता पार्टी, यशवंत सिन्हा ने 2018 में भारतीय सब लोग पार्टी और केशुभाई पटेल ने 2012 में गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाई। परंतु नतीजा यह रहा कि ज्यादातर को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। कल्याण सिंह, उमा भारती, येदियुरप्पा, मरांडी और केशुभाई वापस भाजपा लौट आए। कारण स्पष्ट है—भाजपा का कैडर, संघ का नेटवर्क और मोदी-शाह की चुनावी मशीनरी के सामने क्षेत्रीय दल लंबी रेस नहीं लड़ पाए।

कर्नाटक कैडर के 2011 बैच के आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने 2019 में नौकरी छोड़ भाजपा जॉइन की। 2021 में वे तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष बने। ‘सिंगम अन्नामलाई’ के नाम से मशहूर इस 41 वर्षीय नेता ने द्रमुक, भ्रष्टाचार, सनातन विरोध और तमिल अस्मिता के मुद्दों पर आक्रामक राजनीति की। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 11 प्रतिशत तक पहुंचाया, जो जयललिता युग के बाद सर्वाधिक था। उन्होंने ‘एन मन, एन मक्कल’ पदयात्रा से ग्रामीण युवाओं में पैठ बनाई। परंतु राष्ट्रीय नेतृत्व से टकराव, टिकट वितरण में हस्तक्षेप और ‘हिंदी थोपने’ के आरोपों पर पार्टी लाइन से अलग बयान उनके इस्तीफे की जमीन पहले ही तैयार कर चुके थे।

अन्नामलाई ने अपनी विचारधारा स्पष्ट करते हुए कहा कि जब भारत विकसित राष्ट्र बनेगा, तब तमिलनाडु का शीर्ष पर होना जरूरी है। तमिल और भारतीय पहचान के बीच अनावश्यक टकराव पैदा किया गया है, जबकि दोनों एक साथ रह सकते हैं। यह बयान सीधे द्रमुक के ‘द्रविड़ मॉडल’ और भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, दोनों को चुनौती देता है। उनका फोकस तीन बिंदुओं पर है—तमिल गौरव, जिसमें जल्लीकट्टू, कीलाडी उत्खनन और तमिल को केंद्र की नौकरियों में प्राथमिकता शामिल है; भ्रष्टाचार विरोध, जिसमें द्रमुक के पहले परिवार और भाजपा के ठेकेदार राज दोनों पर हमला है; तथा जीएसटी, नीट और वित्तीय आवंटन में राज्यों के अधिकारों की मांग।

2024 के बाद भाजपा ने ‘लुक साउथ’ नीति तेज की थी और अन्नामलाई उसका प्रमुख चेहरा थे। उनके जाने से तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल में स्थानीय नेताओं का मनोबल प्रभावित हो सकता है। दिल्ली से पैराशूट नेतृत्व का आरोप भी गहरा सकता है। 2029 के लिए 129 लोकसभा सीटों वाले दक्षिण भारत में भाजपा की राह कठिन हो सकती है। यह उप-राष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद के बीच नया ‘सेंटर-राइट’ स्पेस बनाने की कोशिश है, जो 1967 के बाद द्रमुक-अन्नाद्रमुक के बाहर तीसरी ताकत बनने का प्रयास कर रहा है।

परंतु तमिलनाडु की परिस्थितियां अलग हैं। यहां भाजपा की जड़ें अभी कमजोर हैं। 2021 विधानसभा चुनाव में उसे 4 सीटें मिलीं और 2024 लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खुला। द्रविड़ दलों का 60 वर्ष पुराना सामाजिक-राजनीतिक तंत्र मौजूद है। ऐसे में अन्नामलाई के पास ‘लूज-लूज’ नहीं, बल्कि ‘विन-विन’ का अवसर है। यदि वे द्रमुक विरोधी राजनीतिक स्पेस पर कब्जा कर लेते हैं, तो 2026 विधानसभा चुनाव में ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा सकते हैं।

दक्षिण की राजनीति पर इसके तीन संभावित असर हो सकते हैं। पहला, द्रमुक-अन्नाद्रमुक ध्रुवीकरण में सेंध। द्रमुक के पास 26 प्रतिशत और अन्नाद्रमुक के पास 20 प्रतिशत कोर वोट है। भाजपा का 11 प्रतिशत वोट हिंदुत्व और मोदी के नाम पर है। यदि अन्नामलाई तमिल अस्मिता, स्वच्छ छवि और मोदी से दूरी का संतुलित मिश्रण तैयार करते हैं, तो शहरी युवा, पहली बार मतदान करने वाले और द्रमुक विरोधी नाडार-वन्नियार समुदाय उनकी ओर आकर्षित हो सकते हैं। 5 से 7 प्रतिशत वोटों का भी स्थानांतरण त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बना सकता है।

दूसरा असर राष्ट्रीय राजनीति में संघीय दलों के उभार के रूप में सामने आ सकता है। ममता बनर्जी, स्टालिन, केजरीवाल और अन्नामलाई जैसे नेता ‘दिल्ली बनाम राज्य’ की बहस को और तेज कर सकते हैं। नीट, यूसीसी और परिसीमन जैसे मुद्दों पर ‘वी द लीडर्स’ जैसा मंच गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा तीसरे मोर्चे की संभावनाओं को बल दे सकता है।

हालांकि भीड़ से वोट तक का सफर आसान नहीं होता। 7 लाख ऑनलाइन समर्थक वोट में तब्दील नहीं होते। पार्टी के लिए संगठन, बूथ प्रबंधन, फंड और जातीय समीकरण जरूरी होते हैं। द्रमुक के पास 2जी से लेकर जल्लीकट्टू तक का नैरेटिव है, जबकि अन्नाद्रमुक के पास एमजीआर और जयललिता की विरासत है। अन्नामलाई के पास फिलहाल गुस्सा है, व्यवस्था नहीं। दूसरी चुनौती भाजपा का ‘वॉशिंग मशीन’ नैरेटिव है, जहां वापस लौटने वाले नेताओं के मामलों के बंद होने की चर्चा होती रही है। अन्नामलाई पर आय से अधिक संपत्ति का मामला भी लंबित है। तीसरी चुनौती तमिलनाडु में हिंदी विरोध की भावना है। यदि अन्नामलाई अत्यधिक राष्ट्रीय छवि अपनाते हैं तो द्रमुक उन्हें आरएसएस की ‘बी-टीम’ बताएगी, और यदि वे अत्यधिक क्षेत्रीय रुख अपनाते हैं तो भाजपा का कोर वोट उनसे दूर हो सकता है।

2026 तय करेगा कि अन्नामलाई आंधी हैं या केवल आहट। 1967 में अन्नादुरै ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था। अब सवाल यह है कि 2026 में अन्नामलाई क्या करेंगे। वे कल्याण सिंह की तरह वापसी करेंगे, येदियुरप्पा की तरह लौटकर फिर सत्ता हासिल करेंगे या एमजीआर की तरह अपना अलग राजनीतिक इतिहास रचेंगे। दक्षिण की राजनीति विचार से कम और अस्मिता से अधिक संचालित होती है। अन्नामलाई ने ‘तमिल फर्स्ट, इंडियन नेक्स्ट’ का जो दांव चला है, वह द्रमुक के द्रविड़ विमर्श और भाजपा के हिंदुत्व विमर्श, दोनों में सेंध लगाने की क्षमता रखता है। यदि ‘वी द लीडर्स’ अगले 10 महीनों में बूथ स्तर तक पहुंच गया तो तमिलनाडु की राजनीति त्रिकोणीय हो सकती है, अन्यथा यह भी एक और राजनीतिक बगावत की फाइल में दर्ज होकर रह जाएगी।

फिलहाल इतना तय है कि ‘सिंगम’ ने दहाड़ लगा दी है। अब देखना यह है कि जंगल का राजा कौन बनता है। दक्षिण की सियासत करवट ले रही है और दिल्ली से चेन्नई तक सभी की नजर अन्नामलाई पर टिकी हुई है। तमिलनाडु के पूर्व भाजपा अध्यक्ष ने अलग राह चुन ली है। 7 लाख समर्थक कुछ ही घंटों में उनके साथ जुड़े हैं और द्रविड़ राजनीति, राष्ट्रीय दलों तथा तमिल अस्मिता के बीच त्रिकोणीय टकराव के स्पष्ट संकेत दिखाई देने लगे हैं।

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