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संपादकीय
25 Jul, 2026

आंगनबाड़ी गोद लेने की योजना, मंशा अच्छी लेकिन चुनौतियां बड़ी

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को आंगनबाड़ी केंद्र गोद देने के निर्देश के बाद संसाधनों की कमी और अतिरिक्त बोझ को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

भोपाल, 25 जुलाई।

मध्यप्रदेश सरकार ने उच्च शिक्षा विभाग के माध्यम से एक नई पहल शुरू की है, जिसके तहत प्रदेश के सभी विश्वविद्यालय और महाविद्यालय आंगनबाड़ी केंद्रों को गोद लेंगे। इस योजना के अंतर्गत कॉलेजों के विद्यार्थियों को इंटर्नशिप और फील्डवर्क के माध्यम से आंगनबाड़ी केंद्रों से जोड़ा जाएगा। उनके फीडबैक के आधार पर सरकार जिलों में संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों के कायाकल्प और सुधार की कार्ययोजना तैयार करेगी। महिला एवं बाल विकास विभाग के आयुक्त द्वारा भेजे गए पत्र के बाद उच्च शिक्षा विभाग ने सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के प्राचार्यों को इस संबंध में निर्देश जारी कर दिए हैं। प्रदेश में कुल 97,882 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं, जिनमें से केवल चार बड़े शहरों—भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर—में ही 7,697 केंद्र हैं।

निश्चित रूप से यह पहल स्वागत योग्य है, क्योंकि इससे दोहरा लाभ होने की संभावना है। पहला, आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिलेगा और दूसरा, उच्च शिक्षा के विद्यार्थियों को जमीनी स्तर का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त होगा। युवा अपनी रचनात्मक सोच और आधुनिक दृष्टिकोण के साथ आंगनबाड़ी की व्यवस्थाओं में सुधार के सुझाव दे सकेंगे और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझ सकेंगे। शासन का उद्देश्य आंगनबाड़ी केंद्रों में सामुदायिक भागीदारी बढ़ाना और बच्चों के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करना है।

लेकिन इस पहल के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है। जब महिला एवं बाल विकास विभाग करोड़ों रुपये का बजट खर्च करने के बाद भी आंगनबाड़ी केंद्रों में समुचित व्यवस्था नहीं कर पा रहा है, तो क्या विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के सहयोग से ही यह समस्या हल हो जाएगी? क्या विभाग अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़कर अब यह भार शिक्षा संस्थानों पर डाल रहा है? आंगनबाड़ी केंद्रों में आज भी मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी है। अधिकांश केंद्रों में न पर्याप्त भवन हैं, न पेयजल, न शौचालय, न खेल सामग्री और न ही पोषण आहार की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित हो पाती है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं पर पहले से ही काम का बोझ अधिक है और उन्हें समय पर मानदेय भी नहीं मिलता। ऐसे में केवल छात्रों के फील्ड विजिट से व्यवस्था कितनी सुधर पाएगी, यह बड़ा प्रश्न है।

प्रदेश के अधिकांश सरकारी विश्वविद्यालय और महाविद्यालय स्वयं संसाधनों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। कई सरकारी कॉलेजों में स्थायी प्राचार्य नहीं हैं। विषय विशेषज्ञ शिक्षकों के पद वर्षों से रिक्त हैं। प्रयोगशालाओं में उपकरणों का अभाव है, पुस्तकालयों में नई पुस्तकें नहीं पहुंच रही हैं और कई भवन जर्जर अवस्था में हैं। अनेक कॉलेजों में एक ही शिक्षक को कई विषय पढ़ाने पड़ रहे हैं। छात्र संख्या के अनुपात में कक्षाओं और फर्नीचर की कमी है। तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास के लिए आवश्यक अधोसंरचना भी पर्याप्त नहीं है। ऐसे में, जब अपने ही संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखना चुनौती बन गया है, तब अतिरिक्त जिम्मेदारी देकर आंगनबाड़ी सुधारने की अपेक्षा कितनी व्यवहारिक है?

उच्च शिक्षा विभाग को यह समझना होगा कि किसी भी संस्थान की पहली जिम्मेदारी अपने विद्यार्थियों के भविष्य को बेहतर बनाना है। यदि किसी कॉलेज में शिक्षकों की कमी है, प्रयोगशालाएं अधूरी हैं और छात्र बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो उससे यह अपेक्षा करना कि वह आंगनबाड़ी केंद्र की पूरी व्यवस्था संभाल लेगा, व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता। इससे न तो कॉलेज अपनी शैक्षणिक गुणवत्ता पर पूरा ध्यान दे पाएंगे और न ही आंगनबाड़ी केंद्रों में अपेक्षित सुधार हो सकेगा। दोनों ही व्यवस्थाएं प्रभावित होने का खतरा रहेगा।

यह भी नहीं कहा जा सकता कि उच्च शिक्षा के विद्यार्थियों को सामाजिक कार्यों से दूर रखा जाए। फील्डवर्क, इंटर्नशिप और सामुदायिक जुड़ाव शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन यह जुड़ाव सहयोग के रूप में होना चाहिए, अतिरिक्त बोझ के रूप में नहीं। विश्वविद्यालय और महाविद्यालय स्वेच्छा से अपने आसपास के आंगनबाड़ी केंद्रों में शैक्षणिक गतिविधियां चला सकते हैं। बच्चों को कहानी सुनाना, चित्रकला सिखाना तथा स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरूक करना जैसे कार्य किए जा सकते हैं। लेकिन भवन मरम्मत, पोषण व्यवस्था और स्टाफ प्रबंधन जैसी जिम्मेदारियां कॉलेजों पर डालना उचित नहीं होगा।

महिला एवं बाल विकास विभाग को अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटना चाहिए। विभाग को आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध कराना चाहिए, भवनों का निर्माण कराना चाहिए तथा पेयजल, शौचालय और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित करनी चाहिए। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के रिक्त पद भरे जाएं, उन्हें समय पर प्रशिक्षण और मानदेय मिले तथा पोषण आहार की गुणवत्ता और आपूर्ति पर कड़ी निगरानी रखी जाए। जब तक विभाग स्वयं अपनी व्यवस्था मजबूत नहीं करेगा, तब तक बाहरी सहयोग से केवल अस्थायी सुधार ही संभव होगा।

उच्च शिक्षा संस्थानों पर अतिरिक्त भार डालने के बजाय पहले उन्हें सशक्त बनाया जाना चाहिए। सरकारी कॉलेजों में शिक्षकों की भर्ती, प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों के लिए विशेष अनुदान तथा आधुनिक तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। जब संस्थान स्वयं मजबूत होंगे, तभी वे समाज के लिए प्रभावी योगदान दे सकेंगे। आंगनबाड़ी गोद लेने की योजना की मंशा अच्छी है और इससे छात्र तथा समाज दोनों को लाभ हो सकता है, लेकिन इसे लागू करने से पहले जमीनी हकीकत को समझना आवश्यक है। बेहतर होगा कि सरकार दोनों विभागों को उनकी मूल जिम्मेदारियों के साथ सशक्त बनाए और फिर सहयोग के आधार पर बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए आगे बढ़े। तभी यह पहल वास्तव में सार्थक सिद्ध होगी।

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