नई दिल्ली, 28 जुलाई।
लोकतंत्र में विरोध करना अधिकार है, लेकिन विरोध के नाम पर गालियां देना कभी अधिकार नहीं हो सकता। आजकल कुछ लोगों ने आंदोलन और अभद्रता के बीच का फर्क ही मिटा दिया है। सरकार से सवाल कम पूछे जाते हैं, कैमरे के सामने खड़े होकर सस्ती लोकप्रियता के लिए गाली-गलौज ज्यादा की जाती है। और फिर उसी हरकत को लोकतंत्र बचाने का नाम दिया जाता है।
सबसे पहले उस फैशन पर बात होनी चाहिए, जिसमें हर दूसरे दिन भारत को "तानाशाही" घोषित कर दिया जाता है। सवाल यह है कि अगर सचमुच तानाशाही होती, तो क्या राजधानी की सड़कों पर खड़े होकर प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक भाषा बोलना, उसका वीडियो बनाना और फिर उसे सोशल मीडिया पर लाखों लोगों तक पहुंचाना इतना आसान होता? जिस व्यवस्था में खुलेआम विरोध हो रहा है, वहीं खड़े होकर उसी व्यवस्था को तानाशाही कहना कम से कम बौद्धिक ईमानदारी तो नहीं है।
सरकार की नीतियों का विरोध कीजिए। बेरोज़गारी पर सवाल पूछिए। शिक्षा व्यवस्था पर बहस कीजिए। महंगाई पर सरकार को घेरिए। संसद से लेकर सड़क तक जवाब मांगिए। यही लोकतंत्र है। लेकिन जब आपके पास तर्क खत्म हो जाते हैं, तब मुंह से सिर्फ गालियां निकलती हैं। अपशब्द कभी तर्क का विकल्प नहीं हो सकते।
आज कुछ तथाकथित आंदोलनकारियों की पूरी राजनीति कैमरे के सामने दो मिनट का वायरल वीडियो बनाने तक सिमट गई है। जितनी गंदी भाषा, उतनी ज्यादा तालियां; जितनी भद्दी टिप्पणी, उतने ज्यादा व्यूज़। मानो देश के गंभीर मुद्दों का समाधान नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर ट्रेंड करना ही सबसे बड़ा लक्ष्य बन गया हो।
कुछ लोगों ने विरोध को विचारों का मंच नहीं, बल्कि अशिष्टता का प्रदर्शन बना दिया है। उन्हें लगता है कि जितनी उत्तेजक भाषा होगी, उतना बड़ा क्रांतिकारी कहलाएंगे। जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है। इतिहास गवाह है कि जिन आंदोलनों ने व्यवस्था बदली, उन्होंने अपने तर्कों, अनुशासन और स्पष्ट उद्देश्य के दम पर बदलाव लाया। केवल शोर, गाली और उकसावे से न कभी कोई आंदोलन सफल हुआ है और न ही समाज का भरोसा जीता जा सकता है।
और सबसे दुखद बात यह है कि कई बार असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। छात्र हितों के नाम पर शुरू हुआ आंदोलन अचानक धर्म को निशाना बनाने लगता है, देवी-देवताओं का अपमान होने लगता है, सेना और पुलिस पर बिना जिम्मेदारी के कीचड़ उछाला जाने लगता है। यह आंदोलन नहीं, मुद्दों का अपहरण है। इससे न छात्रों का भला होता है, न लोकतंत्र का और न ही उस उद्देश्य का जिसके नाम पर लोग सड़कों पर उतरते हैं।
लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता किसी को अश्लीलता, अभद्रता और व्यक्तिगत अपमान का लाइसेंस नहीं देती। विरोध की ताकत आपकी आवाज़ में नहीं, आपके तर्क में होती है। यदि आंदोलन गालियों के सहारे चल रहा है, तो समझ लीजिए कि उसके पास विचारों का दिवालियापन है।
देश बदलना है तो तथ्यों से लड़िए, बहस कीजिए और सरकार को कठघरे में खड़ा कीजिए। लेकिन यदि पूरी राजनीति सिर्फ अपशब्दों, सस्ती नौटंकी और वायरल क्लिप तक सीमित रह जाएगी, तो नुकसान किसी सरकार का नहीं, लोकतांत्रिक संस्कृति का होगा।
याद रखिए, गाली देना साहस नहीं होता। साहस तब होता है जब आप तथ्यों के साथ सत्ता से सवाल पूछते हैं। बाकी सब सिर्फ शोर है—और शोर कभी परिवर्तन नहीं लाता।
















