नई दिल्ली, 28 जुलाई।
भारत में बच्चों और किशोरों में मोटापा, मधुमेह और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इसी चुनौती को देखते हुए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और राष्ट्रीय पोषण संस्थान (एनआईएन) ने जंक फूड तथा अत्यधिक चीनी, नमक और वसा वाले खाद्य पदार्थों पर हेल्थ टैक्स लगाने का सुझाव दिया है। तर्क यह है कि जैसे तंबाकू और शराब पर अतिरिक्त कर लगाकर उनकी खपत कम करने की कोशिश की गई, वैसे ही अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों के सेवन पर भी अंकुश लगाया जा सकता है।
जंक फूड में पोषक तत्व बेहद कम, जबकि कैलोरी, चीनी, नमक और ट्रांस फैट अत्यधिक मात्रा में होते हैं। इनके लगातार सेवन से मोटापा, टाइप-2 मधुमेह, हृदय रोग और बच्चों में कमजोर प्रतिरक्षा जैसी समस्याएं बढ़ती हैं। आईसीएमआर के विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह सार्वजनिक स्वास्थ्य का गंभीर संकट बन सकता है।
हेल्थ टैक्स का उद्देश्य केवल राजस्व बढ़ाना नहीं, बल्कि लोगों की खान-पान की आदतों में बदलाव लाना है। कीमत बढ़ने से जंक फूड की मांग घट सकती है और कंपनियों पर कम चीनी, नमक व वसा वाले उत्पाद विकसित करने का दबाव बनेगा। इससे स्वस्थ विकल्पों को बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि, केवल टैक्स लगा देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। यदि पौष्टिक भोजन सस्ता और सुलभ नहीं होगा, स्कूल-कॉलेजों में स्वस्थ भोजन उपलब्ध नहीं कराया जाएगा और भ्रामक विज्ञापनों पर नियंत्रण नहीं होगा, तो टैक्स केवल महंगाई बढ़ाने का माध्यम बनकर रह जाएगा।
इसलिए हेल्थ टैक्स तभी प्रभावी होगा, जब इसके साथ जनजागरूकता, स्पष्ट फूड लेबलिंग, बच्चों को लक्षित विज्ञापनों पर नियंत्रण और सस्ते, पौष्टिक विकल्पों को बढ़ावा देने जैसी नीतियां भी समानांतर रूप से लागू की जाएं। तभी यह कदम बीमारी रोकने का प्रभावी हथियार साबित होगा।
















