भोपाल, 28 जुलाई।
सरकार के खजाने से खर्च हुई 60,113 करोड़ रुपये की राशि का हिसाब अभी तक नहीं मिल पाया है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट ने राज्य सरकार के वित्तीय अनुशासन की पोल खोलकर रख दी है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024-25 में राज्य सरकार ने 81,113 करोड़ रुपये विभिन्न योजनाओं और परियोजनाओं के लिए आवंटित किए थे, लेकिन इसमें से केवल 42,305 करोड़ रुपये के ही उपयोगिता प्रमाण-पत्र विभागों द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं। यानी कुल आवंटित राशि का 76 प्रतिशत खर्च तो दिखाया गया है, लेकिन उसके दस्तावेज और प्रमाण सरकार के पास नहीं हैं।
कैग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि उपयोगिता प्रमाण-पत्र न देना वित्तीय नियमों का सीधा उल्लंघन है। जब सरकार किसी विभाग को पैसा देती है तो वह विभाग उस पैसे को किस काम में खर्च किया, यह बताने के लिए उपयोगिता प्रमाण-पत्र देता है। इसी प्रमाण-पत्र के आधार पर तय होता है कि पैसा सही जगह लगा या नहीं। अगर प्रमाण-पत्र ही नहीं मिलेगा तो यह कैसे पता चलेगा कि 60,113 करोड़ रुपये सच में जनता के कल्याण पर खर्च हुए या किसी और मद में चले गए।
यह पहली बार नहीं है। कैग ने बताया कि वर्ष 2019 से अब तक लगभग 720 करोड़ रुपये और अंशदान-मुक्त निधि से संबंधित खर्चों के भी प्रमाण-पत्र लंबित हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, सामाजिक न्याय एवं निशक्तजन कल्याण विभाग, ग्रामीण विकास और नगरीय विकास जैसे बड़े विभाग इस सूची में सबसे ऊपर हैं। अकेले पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग पर 20,453 करोड़ रुपये का उपयोगिता प्रमाण-पत्र बाकी है। सामाजिक न्याय विभाग पर 20,045 करोड़ रुपये और ग्रामीण विकास विभाग पर 8,051 करोड़ रुपये का हिसाब नहीं दिया गया है।
जब हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं तो विभाग प्रमाण-पत्र देने में इतनी देरी क्यों कर रहे हैं? कैग की रिपोर्ट के अनुसार इसका सीधा कारण जवाबदेही का अभाव है। विभागों में न तो समय पर ऑडिट होता है और न ही खर्च के दस्तावेज दुरुस्त रखे जाते हैं। कई बार योजना का पैसा निकाल तो लिया जाता है, लेकिन वह जमीन पर दिखता ही नहीं है। कुछ मामलों में पैसा निकालकर अन्य कामों में डायवर्ट कर दिया जाता है और बाद में उसका हिसाब नहीं मिलता।
इसका असर सीधे जनता पर पड़ता है। मध्यप्रदेश में हर साल शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और रोजगार की योजनाओं के लिए अरबों रुपये का बजट पास होता है, लेकिन जब पैसा खर्च होने के बाद उसका प्रमाण ही नहीं होगा तो यह कैसे तय होगा कि स्कूल बना या नहीं, अस्पताल में दवाएं पहुंचीं या नहीं और गरीबों को आवास मिला या नहीं। कैग ने कहा है कि प्रमाण-पत्र न मिलने से सरकार को यह आकलन करने में दिक्कत होती है कि अगली बार किस योजना के लिए कितना पैसा चाहिए और किस विभाग का प्रदर्शन कैसा रहा।
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि 60,113 करोड़ रुपये की राशि छोटी नहीं है। यह मध्यप्रदेश के एक साल के स्वास्थ्य और शिक्षा बजट से भी ज्यादा है। अगर इतना बड़ा पैसा बिना हिसाब के हवा में लटका रहेगा तो राज्य का कर्ज बढ़ेगा और विकास की रफ्तार रुकेगी। पहले से ही राज्य पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। ऐसे में यह लापरवाही और महंगी पड़ सकती है।
कैग ने सरकार को सिफारिश की है कि सभी विभागों को तीन महीने के अंदर लंबित उपयोगिता प्रमाण-पत्र जमा करने के निर्देश दिए जाएं। इसके लिए एक निगरानी तंत्र बनाया जाए, जो हर तिमाही में समीक्षा करे और देरी करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो। साथ ही ऑनलाइन ट्रैकिंग सिस्टम लागू किया जाए, ताकि जैसे ही पैसा जारी हो, उसका उपयोग और प्रमाण-पत्र की स्थिति तुरंत देखी जा सके।
सरकार की ओर से अभी इस पर कोई ठोस जवाब नहीं आया है, लेकिन सूत्रों के अनुसार वित्त विभाग ने सभी प्रमुख सचिवों को पत्र लिखकर लंबित प्रमाण-पत्र जल्द जमा करने को कहा है। मुख्यमंत्री ने भी समीक्षा बैठक में नाराजगी जताई है और कहा है कि पैसा खर्च करना ही काफी नहीं है, उसका हिसाब देना भी जरूरी है।
यह मामला केवल कागजों का नहीं है, यह जनता के भरोसे का मामला है। जब लोग टैक्स देते हैं तो उम्मीद करते हैं कि वह पैसा उनके बच्चों की पढ़ाई, उनके इलाज और उनके गांव की सड़क पर लगेगा। अगर वही पैसा बिना हिसाब के रह जाएगा तो भरोसा टूटेगा और लोकतंत्र कमजोर होगा।
मध्यप्रदेश में पिछले कुछ सालों में डिजिटल गवर्नेंस और पारदर्शिता की बात बहुत हुई है। ई-टेंडरिंग, डीबीटी और पोर्टल के जरिए काम करने का दावा किया गया है, लेकिन कैग की यह रिपोर्ट बताती है कि जमीनी स्तर पर अभी भी बहुत काम बाकी है। तकनीक तभी काम करेगी, जब उसे चलाने वाले अधिकारी जिम्मेदार बनें।
इस रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने भी सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि 60,113 करोड़ रुपये का हिसाब न देना भ्रष्टाचार को न्योता देना है। सत्ता पक्ष का तर्क है कि कई योजनाएं बहुवर्षीय हैं और उनका काम अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए प्रमाण-पत्र में देरी हो रही है। लेकिन कैग ने साफ कहा है कि देरी का कारण चाहे जो भी हो, नियम के अनुसार हर वित्तीय वर्ष के अंत में प्रमाण-पत्र देना अनिवार्य है।
आगे की राह कठिन है, लेकिन असंभव नहीं है। सरकार को अब तीन स्तरों पर काम करना होगा। पहला, सभी विभागों में आंतरिक ऑडिट को मजबूत करना। दूसरा, अधिकारियों और कर्मचारियों को वित्तीय नियमों का प्रशिक्षण देना। तीसरा, सख्त जवाबदेही तय करना। जो विभाग समय पर प्रमाण-पत्र न दे, उसके बजट में कटौती की जाए और जिम्मेदार अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।
मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है और यहां विकास की संभावनाएं भी बहुत हैं, लेकिन विकास के लिए पैसा ही काफी नहीं होता। उस पैसे का सही उपयोग और उसका सही हिसाब भी जरूरी होता है। कैग की रिपोर्ट एक चेतावनी है, एक आईना है। अगर अभी नहीं चेते तो आने वाले समय में यह 60,113 करोड़ रुपये का आंकड़ा और बड़ा हो सकता है।
सरकार को चाहिए कि वह इस रिपोर्ट को गंभीरता से ले और इसे सिर्फ एक औपचारिकता न समझे। जनता को जानने का अधिकार है कि उसका पैसा कहां गया और कैसे खर्च हुआ। पारदर्शिता से ही सुशासन आता है और सुशासन से ही जनता का विश्वास बढ़ता है। इसलिए अब देर नहीं होनी चाहिए। 60,113 करोड़ रुपये का हिसाब तुरंत जनता के सामने आना चाहिए। तभी यह कहा जा सकेगा कि मध्यप्रदेश सही मायने में विकास के रास्ते पर चल रहा है।

















