भोपाल, 28 जुलाई।
मध्यप्रदेश के एक गांव में सुबह नौ बजे की धूप में कुछ बच्चे पेड़ के नीचे बैठे हैं। पास में कोई इमारत नहीं है, कोई बेंच नहीं है और न ही कोई कार्यकर्ता। यह दृश्य किसी एक गांव का नहीं है। यह उन 8842 गांवों की कहानी है, जहां आज भी आंगनबाड़ी केंद्र नहीं पहुंच पाया है।
आंगनबाड़ी को हम बच्चों की पहली पाठशाला कहते हैं। इसे कुपोषण और असमानता के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार भी माना जाता है। लेकिन जब योजनाओं की फाइलों से बाहर निकलकर जमीन पर जाते हैं तो तस्वीर बदल जाती है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में 54,903 गांव हैं। इनमें से 16 प्रतिशत गांव ऐसे हैं, जहां आंगनबाड़ी का एक भी केंद्र नहीं है। यानी हर छह गांव में से एक गांव आज भी इस सुविधा से वंचित है।
और जिन गांवों में केंद्र हैं, वहां की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि मौजूदा केंद्रों में से 16 प्रतिशत में बिजली नहीं है, पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है, शौचालय नहीं है और बैठने की पर्याप्त जगह भी नहीं है। कई इमारतें जर्जर हैं, छत टपकती है, गर्मी में पंखा नहीं चलता और सर्दी में अलाव तक नहीं होता। यही वह जगह है, जहां से एक बच्चे की सीख और सेहत की नींव रखी जानी थी।
आंगनबाड़ी योजना दशकों से चल रही है। हर साल बजट आता है, हर जिले में अधिकारी हैं, फिर भी 8842 गांव छूट कैसे गए? इसका एक कारण मानकों और हकीकत के बीच का फासला है। नियम कहता है कि 800 की आबादी पर एक केंद्र होना चाहिए, लेकिन कई बार प्रस्ताव ही नहीं बनते। कई बार बनते हैं तो स्वीकृति नहीं मिलती और कई बार जमीन के चक्कर में फाइल अटक जाती है। नतीजा यह कि कुछ गांवों में दो-दो केंद्र चल रहे हैं और कुछ गांव पूरी तरह अनदेखे रह गए हैं।
बड़ी समस्या संसाधनों की है। एक कार्यकर्ता के कंधों पर 40 से 50 बच्चों की जिम्मेदारी है। साथ में रजिस्टर भरना, सर्वे करना, टीकाकरण में मदद करना और बैठकों में जाना भी है। इतने काम में न तो पढ़ाई हो पाती है और न ही बच्चों की देखभाल। मानदेय भी समय पर नहीं मिलता। इसलिए नए लोग इस काम में आने से कतराते हैं और पुराने लोग थक जाते हैं।
पोषण आहार भी कई केंद्रों तक समय पर नहीं पहुंचता। मेन्यू में लिखी दाल, सब्जी, फल और दूध बच्चों तक नहीं पहुंच पाते। भंडारण की जगह नहीं होने से सामान खराब हो जाता है। रजिस्टर में कभी संख्या ज्यादा दिखा दी जाती है, कभी कम, ताकि कागजों पर सब ठीक लगे, लेकिन बच्चों की थाली में कुछ नहीं बचता।
इसका असर सीधे बच्चों पर पड़ता है। जिन गांवों में केंद्र नहीं हैं, वहां बच्चे पोषण से वंचित रह जाते हैं। उनकी शुरुआती सीख रुक जाती है और जब वे स्कूल जाते हैं तो पहले से ही पीछे होते हैं। जिन केंद्रों में सुविधाएं नहीं हैं, वहां माताएं बच्चों को भेजने से डरती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वहां सुरक्षा नहीं है। इस तरह एक पूरी पीढ़ी के पहले छह साल कमजोर हो जाते हैं और बाद में उन्हें संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है।
सबसे पहले उन 8842 गांवों को प्राथमिकता देनी होगी, जहां एक भी केंद्र नहीं है। इसके लिए पंचायतों और स्थानीय लोगों को साथ लेना होगा। स्कूल, पंचायत भवन या सामुदायिक केंद्र में अस्थायी व्यवस्था कर तुरंत शुरुआत की जा सकती है। किराये की व्यवस्था भी एक विकल्प है, लेकिन अब और इंतजार करना ठीक नहीं है।
सभी मौजूदा केंद्रों में छह महीने के भीतर बिजली, पानी और शौचालय की सुविधा सुनिश्चित करनी होगी। यह काम अकेले महिला एवं बाल विकास विभाग का नहीं है। इसमें पंचायत, ग्रामीण विकास और ऊर्जा विभाग को भी साथ आना होगा।
पोषण आहार की आपूर्ति को पारदर्शी बनाना होगा। हर केंद्र में डिजिटल हाजिरी और स्टॉक की निगरानी हो, ताकि पता चल सके कि सामान कब आया, कब बना और बच्चों को मिला या नहीं।
खाली पदों को तुरंत भरा जाए और मानदेय समय पर दिया जाए, ताकि काम करने वालों का भरोसा बना रहे। साथ ही हर महीने जिलों की रैंकिंग सार्वजनिक की जाए कि कितने नए केंद्र खुले और कितने केंद्रों में बुनियादी सुविधाएं पूरी हुईं, ताकि जवाबदेही तय हो सके।
यह लड़ाई केवल सरकार की नहीं है, यह समाज की भी है। जब तक गांव का सरपंच, शिक्षक और अभिभावक यह नहीं पूछेंगे कि हमारे गांव में आंगनबाड़ी क्यों नहीं है, तब तक फाइलें चलती रहेंगी और बच्चे इंतजार करते रहेंगे। आंगनबाड़ी केवल एक इमारत नहीं है। यह उस मां जैसी जगह है, जहां बच्चा पहली बार अक्षर सीखता है, पहली बार समूह में बैठता है और पहली बार पोषण पाता है। अगर यही जगह अधूरी होगी तो आगे की पूरी सीढ़ी कमजोर हो जाएगी।
हमें आंकड़ों से बाहर निकलकर बच्चों के चेहरे देखने होंगे। हर गांव में एक मजबूत केंद्र, हर केंद्र में बुनियादी सुविधाएं और हर बच्चे तक पोषण तथा शिक्षा पहुंचाना ही असली विकास है।
बच्चों के पहले छह साल लौटकर नहीं आते। अगर आज हमने उन 8842 गांवों को नजरअंदाज किया तो कल वही बच्चे हमसे पूछेंगे कि जब आपके पास मौका था तो आपने हमारी पहली पाठशाला क्यों नहीं बनाई। उस सवाल का जवाब हमारे पास नहीं होना चाहिए।

















