कोलकाता, 30 जुलाई।
बंगाल की तहजीब में "बारह महीने तेरह पर्व" की रवायत सदा से कायम रही है और यहां की प्राचीन मूर्तिकला बहुत हद तक मिट्टी के पुतले गढ़ने पर टिकी है। भले ही प्लास्टिक के बढ़ते चलन की वजह से कुम्हारों के पारंपरिक कारोबार में थोड़ी गिरावट आई हो, मगर मिट्टी की प्रतिमाओं की डिमांड में लगातार इजाफा हो रहा है।
मूरत तैयार करने के वास्ते खास किस्म की मिट्टी की जरूरत पड़ती है, जिसमें चिकनी और बलुआ मिट्टी सबसे ज्यादा मुफीद मानी जाती है। मगर पिछले तकरीबन पंद्रह सालों से माटी की अवैध खरीद-फरोख्त का एक बड़ा सिंडिकेट सक्रिय हो चुका है। मिट्टी माफियों के बढ़ते दखल के कारण कलाकारों को सही माटी हासिल करने में भारी जद्दोजहद का सामना करना पड़ रहा है, और हावड़ा का आमता विधानसभा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं बचा है।

फितरत से सीधे और परिश्रमी मूर्तिकार इन माफियाओं से बैर मोल लेना नहीं चाहते। इस दुविधा से निजात पाने के खातिर आमता क्षेत्र के शिल्पकारों ने स्थानीय विधायक अमित सामंत से मिलकर अपना दुखड़ा रोया। उनकी समस्याएं सुनने के बाद विधायक ने हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया और कहा कि थानों से बातचीत करके कलाकारों के लिए एक स्पेशल कार्ड जारी किया जाएगा जिससे प्रशासन या माफिया उन्हें परेशान न कर सकें।
जनप्रतिनिधि के इस आश्वासन से आमता के कुम्हारों के दिलों में एक नई आस जगी है। उनका मानना है कि यदि यह व्यवस्था जमीन पर उतरती है तो आने वाले दिनों में मूर्तियां बनाने के लिए माटी का इंतजाम करना आसान हो जाएगा और उनकी दिक्कतें काफी हद तक कम हो जाएंगी।

















