भोपाल, 30 जुलाई।
मध्यप्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर किसानों की नाराजगी ने जिस तरह आंदोलन का रूप लिया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि कृषि से जुड़े फैसलों में व्यवहारिकता और समय पर संवाद कितना आवश्यक है। प्रति एकड़ केवल 120 किलो मूंग खरीदी की सीमा और ई-टोकन व्यवस्था ने उन किसानों की चिंता बढ़ा दी, जिनकी इस वर्ष पैदावार सामान्य से कहीं अधिक हुई है। ऐसे में स्वाभाविक है कि उन्हें अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिलने की चिंता सताए।
किसानों की मांग केवल खरीद सीमा बढ़ाने की नहीं है, बल्कि यह भरोसा दिलाने की भी है कि उनकी पूरी उपज को सम्मानजनक कीमत मिल सके। यदि पर्याप्त खरीद नहीं हुई तो बड़ी मात्रा में फसल खुले बाजार में कम दाम पर बेचनी पड़ेगी, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। दूसरी ओर, आंदोलन के कारण राजधानी में जाम और अव्यवस्था से आम नागरिकों को भी भारी परेशानी झेलनी पड़ी। इसलिए ऐसा समाधान जरूरी है, जिसमें किसान और आमजन दोनों के हित सुरक्षित रहें।
सकारात्मक पक्ष यह है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस मामले में संवाद का रास्ता चुना है। कृषि मंत्री को किसानों से चर्चा करने और केंद्र सरकार से मूंग खरीद का कोटा बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास करने के निर्देश दिए गए हैं। केंद्र को अतिरिक्त खरीद की मांग भेजना और किसान प्रतिनिधियों से बातचीत की पहल यह संकेत देती है कि सरकार समस्या को टकराव से नहीं, सहमति से हल करना चाहती है।
लोकतंत्र में संवाद ही सबसे प्रभावी माध्यम है। सरकार को चाहिए कि किसानों की वास्तविक उपज के अनुरूप खरीद व्यवस्था में आवश्यक लचीलापन लाए और ई-टोकन जैसी प्रक्रियाओं को अधिक सरल बनाए। वहीं किसान संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपनी बात शांतिपूर्ण और रचनात्मक तरीके से रखें। जब दोनों पक्ष विश्वास और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ेंगे, तभी ऐसा समाधान निकलेगा जो किसानों की मेहनत का सम्मान करे और व्यवस्था की विश्वसनीयता भी बनाए रखे।
















