मध्यप्रदेश, 30 जुलाई।
मध्यप्रदेश को देश का टाइगर स्टेट कहा जाता है और यह गर्व की बात भी है, क्योंकि वर्ष 2022 की गणना में प्रदेश में 785 बाघ दर्ज किए गए थे, जो देश में सबसे अधिक हैं। पिछले एक दशक में बाघों की संख्या 308 से बढ़कर 785 तक पहुंची है। यह आंकड़ा बताता है कि संरक्षण के प्रयासों से बाघों की आबादी बढ़ी है और प्रदेश ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। लेकिन इसी उपलब्धि के साथ एक चिंताजनक सच भी सामने है। बाघों की संख्या बढ़ने के साथ उनकी मौतों का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो हमारी यह पहचान धूमिल हो सकती है।
वर्ष 2022 से अब तक 218 बाघों की मौत दर्ज की जा चुकी है। वर्ष 2022 में 34, वर्ष 2023 में 43, वर्ष 2024 में 46, वर्ष 2025 में 55 और वर्ष 2026 में अब तक 40 बाघों की मौत हो चुकी है। ये आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि चेतावनी हैं कि जंगल के राजा के सामने अब नए और गंभीर खतरे खड़े हो गए हैं। बाघों की आबादी बढ़ी है तो जंगल में जगह की कमी हुई है। भोजन और पानी के लिए संघर्ष बढ़ा है और इसी कारण बाघों के बीच क्षेत्रीय टकराव भी बढ़े हैं, जिसका परिणाम मौत के रूप में सामने आ रहा है।
समस्या की जड़ में कई कारण हैं। पहला कारण आवास का सिकुड़ना है। जंगलों के आसपास आबादी बढ़ रही है। सड़कें, रेल लाइनें और अन्य विकास परियोजनाएं जंगलों को विभाजित कर रही हैं, जिससे बाघों के विचरण के लिए कॉरिडोर प्रभावित हो रहे हैं। जब बाघ अपने क्षेत्र से बाहर निकलते हैं, तो वे मानव बस्तियों के करीब पहुंच जाते हैं और संघर्ष की स्थिति बनती है। दूसरा कारण शिकार और अवैध व्यापार है। हालांकि सरकार ने इस पर कड़ी निगरानी रखी है, लेकिन कुछ क्षेत्रों से तस्करी की खबरें अब भी सामने आती रहती हैं। तीसरा कारण प्राकृतिक मौतें हैं। बूढ़े और बीमार बाघों की मृत्यु स्वाभाविक है, लेकिन बढ़ती आबादी के कारण यह संख्या भी अधिक दिखाई दे रही है।
टाइगर स्टेट की उपाधि केवल गर्व का विषय नहीं, बल्कि बड़ी जिम्मेदारी भी है। दुनिया की नजरें मध्यप्रदेश पर हैं कि वह अपने बाघों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करता है। पर्यटन, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिक संतुलन तीनों ही बाघों से जुड़े हैं। इसलिए सबसे पहले बाघों के लिए सुरक्षित आवास और मजबूत कॉरिडोर विकसित करने होंगे। बफर जोन को प्रभावी बनाना, मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करना, प्रभावित परिवारों को समय पर मुआवजा देना और वन विभाग को आधुनिक तकनीक तथा पर्याप्त संसाधनों से सशक्त करना जरूरी है। कैमरा ट्रैप, ड्रोन और जीपीएस कॉलर जैसी तकनीकों से निगरानी बढ़ाई जा सकती है। साथ ही स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाकर संरक्षण को जन आंदोलन का रूप देना होगा।
मध्यप्रदेश ने यह साबित किया है कि वह बाघों की संख्या बढ़ा सकता है। अब चुनौती यह है कि उनकी मौतों पर भी प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जाए। केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है। बाघ हमारे जंगलों की शान और प्राकृतिक धरोहर हैं। उनकी हर मौत संरक्षण व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है। इसलिए अब समय ठोस कार्ययोजना और प्रभावी क्रियान्वयन का है, ताकि टाइगर स्टेट की पहचान आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।
















