नई दिल्ली, 5 अगस्त।
देश की सड़कों पर बड़ी संख्या में बिना बीमा वाले वाहन चलने पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक पायलट परियोजना के तहत वैध वाहन बीमा को ईंधन आपूर्ति से जोड़ने का सुझाव दिया है। न्यायालय ने कहा कि बिना बीमा वाले वाहनों की बढ़ती संख्या अनिवार्य मोटर बीमा के उद्देश्य को कमजोर कर रही है और दुर्घटना पीड़ितों को समय पर मुआवजा मिलने में बाधा बन रही है।
न्यायालय की पीठ ने भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) को निर्देश दिया कि नई निजी कारों के लिए अनिवार्य तृतीय पक्ष बीमा की अवधि तीन वर्ष से बढ़ाकर चार वर्ष तथा नए दोपहिया वाहनों के लिए पांच वर्ष से बढ़ाकर छह वर्ष की जाए। न्यायालय के अनुसार, देश में करीब 56 प्रतिशत वाहन वैध बीमा के बिना चल रहे हैं, जो गंभीर स्थिति है।
यह मामला उस अपील की सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें एक बीमा कंपनी ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें सड़क दुर्घटना में अपने बीमित वाहन में यात्रा कर रहे व्यक्ति के स्वजन को मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। अपील खारिज करते हुए न्यायालय ने बिना बीमा वाले वाहनों, सड़क सुरक्षा और मोटर बीमा व्यवस्था से जुड़े व्यापक मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए।
न्यायालय ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय तथा आईआरडीएआई को ऐसा पायलट मॉडल तैयार करने को कहा, जिसमें वाहन के वैध बीमा की स्थिति के आधार पर ईंधन उपलब्ध कराया जा सके। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने सिद्धांततः इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नहीं जताई है।
इसके अलावा न्यायालय ने स्वचालित नंबर प्लेट पहचान कैमरों को वाहन डेटाबेस और बीमा सूचना प्रणाली से जोड़ने का निर्देश दिया, ताकि बिना बीमा वाले वाहनों की पहचान कर स्वतः ई-चालान जारी किए जा सकें। राज्यों से यह भी कहा गया कि यातायात पुलिस को ऐसे हैंडहेल्ड उपकरण या मोबाइल अनुप्रयोग उपलब्ध कराए जाएं, जिनसे मौके पर ही वाहन के बीमा की स्थिति की जांच की जा सके।
संशोधित प्रावधान लागू होने के बाद बिना बीमा वाहन चलाने पर कड़ी कार्रवाई करने का भी निर्देश दिया गया। पहली बार उल्लंघन करने पर वाहन के वार्षिक बीमा प्रीमियम के तीन गुना या पांच हजार रुपये, जो अधिक हो, का जुर्माना लगाया जाएगा। दोबारा उल्लंघन होने पर यह राशि प्रीमियम के पांच गुना या दस हजार रुपये, जो अधिक हो, निर्धारित की गई है।
न्यायालय ने नागरिकों के लिए भी ऐसा तंत्र विकसित करने का सुझाव दिया, जिससे वे किसी वाहन के बीमा की स्थिति की पुष्टि कर सकें और बिना बीमा वाले वाहनों की सूचना दे सकें। साथ ही बैरियर रहित टोल व्यवस्था के लिए स्वचालित नंबर प्लेट पहचान तकनीक पर आधारित पायलट परियोजनाओं को जारी रखने को कहा, ताकि टोल प्लाजा पर लगने वाली कतारें कम हों और सड़क सुरक्षा बेहतर हो सके।
मोटर बीमा को सरल बनाने के लिए न्यायालय ने निजी वाहनों हेतु चार स्तर की नीति संरचना को मंजूरी दी। इसमें तृतीय पक्ष बीमा अनिवार्य रहेगा, जबकि यात्रियों की कानूनी जिम्मेदारी, व्यक्तिगत दुर्घटना सुरक्षा और वाहन क्षति बीमा जैसे अतिरिक्त विकल्प अलग से उपलब्ध होंगे। बीमा खरीदने वाले प्रत्येक व्यक्ति को ऑनलाइन और ऑफलाइन मानकीकृत विकल्प प्रपत्र उपलब्ध कराने तथा अनिवार्य और वैकल्पिक सुरक्षा की स्पष्ट जानकारी देने का भी निर्देश दिया गया।
न्यायालय ने आईआरडीएआई को बीमा कंपनियों के साथ मिलकर वैकल्पिक बीमा योजनाओं की एक समान शर्तें तैयार करने के लिए भी कहा। साथ ही कंपनियों को अपनी वेबसाइट पर व्यापक मोटर बीमा योजनाओं के लाभ सरल भाषा में प्रमुखता से प्रदर्शित करने का निर्देश दिया गया।
दुर्घटना मुआवजा मामलों में देरी दूर करने के लिए राज्यों की पुलिस को 31 मार्च 2022 से पहले के लंबित मामलों में विस्तृत दुर्घटना प्रतिवेदन और आवश्यक दस्तावेज समय पर प्रस्तुत करने को कहा गया। गवाहों की समय पर उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए, ताकि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में मामलों का शीघ्र निस्तारण हो सके।
न्यायालय ने कहा कि अनिवार्य बीमा का उद्देश्य केवल पीड़ितों को मुआवजा दिलाना नहीं, बल्कि उन्हें लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया में उलझने से बचाना भी है। संसदीय समिति की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि देश के 30.48 करोड़ पंजीकृत वाहनों में से 16.54 करोड़ बिना बीमा हैं और भारत में हर वर्ष 4.8 लाख से अधिक सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। न्यायालय ने सड़क सुरक्षा को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
मूल मामले में न्यायालय ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए मृतक के परिवार को 10 लाख 500 रुपये तथा 7.5 प्रतिशत ब्याज के साथ मुआवजा देने के निर्देश को सही माना। न्यायालय ने कहा कि व्यापक बीमा पॉलिसी में वाहन का स्वामी भी संरक्षण के दायरे में आता है और ऐसे मामलों में अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाया जाना चाहिए। सभी संबंधित पक्षों को 14 अगस्त तक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने और मामले को 18 अगस्त को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया। उल्लेखनीय है कि यह दुर्घटना जुलाई 1996 में हुई थी और लगभग तीन दशक बाद इस मामले का अंतिम निपटारा हुआ।















