भोपाल, 16 सितंबर।
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भोपाल में समान नागरिक संहिता का विरोध किया। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में आदिवासियों को उनकी संस्कृति और परंपराओं के आधार पर यूसीसी से बाहर रखा गया है, तो मुसलमानों को इसके दायरे में क्यों शामिल किया गया है। ओवैसी ने कहा कि मुसलमानों के भी अपने धार्मिक कानून और पहचान हैं।
भोपाल के सेंट्रल लाइब्रेरी मैदान में आयोजित जनसभा में ओवैसी ने कहा कि एक धर्म से जुड़े कानून दूसरे धर्म के लोगों पर लागू करना उचित नहीं है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 29 का हवाला देते हुए धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकारों का उल्लेख किया। उनके यूसीसी संबंधी बयानों की रिपोर्ट भी सामने आई है।
ओवैसी ने राज्य सरकार पर यूसीसी के जरिए हिंदू विवाह, उत्तराधिकार और दत्तक एवं अभिभावकत्व से जुड़े कानूनों को गैर-हिंदुओं पर लागू करने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इसी आधार पर समान नागरिक संहिता का विरोध कर रही है।
एआईएमआईएम प्रमुख ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल दलों से भी यूसीसी का विरोध करने की अपील की। उन्होंने तेलुगु देशम पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, चिराग पासवान, एचडी कुमारस्वामी और जयंत चौधरी का नाम लेते हुए अपनी बात रखी।
सभा में ओवैसी ने भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा के एक पुराने बयान का जिक्र करते हुए उन्हें काजी कैंप आने की चुनौती दी। उन्होंने क्षेत्र के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े लोगों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह अपने रुख पर कायम हैं।
ओवैसी ने सागर जहरीली शराब मामले में कार्रवाई की मांग भी की। उन्होंने भाजपा शासित राज्यों में मस्जिदों और कब्रिस्तानों को नुकसान पहुंचाए जाने के आरोप लगाए। लव जिहाद से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि दो बालिग अपनी इच्छा से विवाह करना चाहते हैं तो उन्हें रोकने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर ओवैसी ने कहा कि उनकी पार्टी कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी, इसका फैसला अभी नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि पार्टी अपने राजनीतिक फैसले खुद लेती है और किसी के दबाव में काम नहीं करती।
मध्य प्रदेश में यूसीसी लागू करने की प्रक्रिया को लेकर ओवैसी ने सरकार की नीति पर भी सवाल उठाए। उनके मुताबिक, उत्तराखंड और अन्य राज्यों में लागू किए गए मॉडल की तरह मध्य प्रदेश में भी व्यवस्था लागू करने की तैयारी है। यूसीसी में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों से जुड़े मामलों के लिए समान कानूनी व्यवस्था का प्रावधान बताया गया है।
















