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त्योहार
03 Mar, 2026

होली पर्व पर बलिया के गड़हांचल में फाग की समृद्ध परंपरा कायम

बलिया के गड़हांचल क्षेत्र में युवा और बुजुर्ग मिलकर फूहड़ता से दूर रहकर पारंपरिक फाग गायन की सदियों पुरानी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

बलिया, 03 मार्च 2026।

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में होली पर गाया जाने वाला फाग अध्यात्म और दर्शन का अनूठा संगम माना जाता है। जनपद बलिया के बिहार सीमा से सटे गड़हांचल क्षेत्र में बुजुर्गों ने फाग गीतों की समृद्ध परंपरा को सहेजते हुए नई पीढ़ी को उससे जोड़ने का सराहनीय प्रयास किया है। इलाके के भरौली गांव में पारंपरिक गीतों को फूहड़ता और आधुनिक प्रभाव से बचाए रखते हुए वसंत पंचमी के बाद से प्रतिदिन शाम दलानों में बुजुर्ग और युवा गोल बनाकर जुटते हैं। परंपरागत वाद्य ‘डाफ’ पर जब जोशपूर्ण थाप पड़ती है तो उम्र की सीमाएं पीछे छूटती नजर आती हैं। डाफ के साथ ‘झाल’ की झंकार वातावरण को रोमांचित कर देती है। हालांकि, फाग की जगह ले रहे फूहड़ गीतों से परंपरा के संवाहक कलाकार आहत हैं और उनका मानना है कि ग्रामीण संस्कृति को जीवित रखने के लिए फाग का चलन बनाए रखना जरूरी है।

एक ओर मोबाइल, सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन ने लोगों को सीमित कर दिया है, वहीं बलिया का यह क्षेत्र ऐसा है जहां फाग की परंपरा युवाओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर रही है। ‘बिरज में हरि होरी मचाई, इतसे आवत नवल राधिका, उत से कुंवर कन्हाई। खेलत फाग परस्पर हिल मिल, शोभा बरनी न जाई, घरे-बाजत बधाई...।’ जैसे गीत होली से करीब दस दिन पहले ही गड़हांचल के गांवों में गूंजने लगते हैं। इन्हें गाने वाले मंचीय कलाकार नहीं, बल्कि गांवों के पुरनिया होते हैं। उनके गोल में युवाओं की भागीदारी इस परंपरा के भविष्य को लेकर उम्मीद जगाती है।

भरौली गांव में होली से पहले और उसके बाद बुढ़वा मंगल तक हर शाम गुझिया, मिठाई, चाय-नमकीन और ठंडई के बीच फाग की स्वर लहरियां माहौल को विशेष बना देती हैं।

सदियों पुरानी इस विरासत को लेकर भरौली के लोगों ने बताया कि वर्तमान समय में होली गीतों के नाम पर बढ़ती अश्लीलता चिंता का विषय है। वयोवृद्ध अक्षय कुमार राय ने कहा कि होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और परंपराओं का प्रतीक है। वसंत पंचमी से ग्रामीण इलाकों में फाग गायन शुरू होकर होली के बाद मंगलवार यानी बुढ़वा मंगल तक चलता है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा केवल भरौली तक सीमित नहीं, बल्कि गड़हांचल और आसपास के गांवों में भी पीढ़ी दर पीढ़ी कायम है।

मशहूर भोजपुरी गायक गोपाल राय के पिता शिवनारायण राय गामा ने बताया कि पहले वसंत पंचमी के बाद गांव-गांव में फाग की गूंज सुनाई देती थी। रात में चौपाल सजती, ढोल-नगाड़े बजते और ‘सदा आनंद रहे एहि द्वारे, मोहन खेले होली’ जैसे गीत वातावरण में रस घोलते थे। उन्होंने कहा कि गांव में नारदीय रामायण गायन की परंपरा भी काफी पुरानी है और सुखद है कि युवा पीढ़ी इसे आगे बढ़ाने में सहयोग दे रही है।

भरौली निवासी और पेशे से शिक्षक संजय कुमार राय ने बताया कि फाग गाने वालों की संख्या कम हुई है और आसपास के गांवों में यह परंपरा कमजोर पड़ती दिख रही है। फिर भी यहां आज भी लोग सामूहिक रूप से ढोलक-मजीरा के साथ फाग गाकर उत्सव मनाते हैं। उन्होंने बताया कि पहले जोगीरा की टोलियां घर-घर जाकर गीत गाती थीं। वहीं सेवानिवृत्त शिक्षक विनोद राय के अनुसार होली गिले-शिकवे मिटाने का पर्व है। होलिका दहन के दूसरे दिन लोग स्थल पर पहुंचकर राख माथे पर लगाते हैं और फाग गाते हुए लौटते हैं, जिससे साल भर की दूरियां पल भर में मिट जाती हैं।

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