पूर्वी सिंहभूम, 16 मई।
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि वर्षों तक नियमित मासिक बिजली बिल जारी न करना और बाद में एक साथ भारी बकाया थोप देना उपभोक्ताओं के साथ अन्याय है तथा इसे सेवा में गंभीर कमी माना जाएगा, जिस पर उपभोक्ता के पक्ष में निर्णय सुनाया गया।
मामला चाईबासा के जेवियर नगर निवासी देवी शंकर दत्ता से संबंधित है, जिन्होंने आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी कि वर्ष 2018 में कनेक्शन मिलने के बाद उन्हें समय पर मासिक बिजली बिल उपलब्ध नहीं कराया गया और लंबे समय तक विभाग की ओर से कोई स्पष्ट बिलिंग नहीं की गई।
आरोप के अनुसार दिसंबर 2024 में अचानक बिजली अधिनियम की धारा 56 के तहत नोटिस जारी करते हुए एक लाख तिरासी हजार 175 रुपये की बकाया राशि 15 दिनों के भीतर जमा करने का निर्देश दिया गया और भुगतान न करने पर बिजली आपूर्ति काटने की चेतावनी भी दी गई।
शिकायतकर्ता ने यह भी बताया कि विभागीय दबाव के चलते उन्होंने पहले 50 हजार रुपये और बाद में जून 2025 में अलग-अलग तिथियों पर 60 हजार रुपये का भुगतान किया, इस प्रकार कुल 1 लाख 10 हजार रुपये जमा किए जाने के बावजूद उन्हें नियमित माहवार बिल नहीं दिया गया।
सुनवाई के दौरान झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड ने स्वीकार किया कि उपभोक्ता के नाम 5 किलोवाट का कनेक्शन है और वर्ष 2024 में एकमुश्त बिल जारी किया गया था, हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया जा सका कि वर्ष 2018 से नियमित बिलिंग क्यों नहीं की गई।
आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह ने अपने आदेश में कहा कि लंबे समय तक बिल जारी न करना उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत सेवा में गंभीर कमी है और बिना मासिक विवरण के अचानक बड़ी राशि की मांग करना मनमाना और नियम विरुद्ध है।
आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड बनाम रहमतुल्लाह खान (2020) मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि दो वर्ष से अधिक पुराने बिजली बकाये की वसूली तभी मान्य है जब वह लगातार बिलों में दर्शाया गया हो, जबकि इस मामले में विभाग ऐसा कोई रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं कर सका।
आयोग ने निर्देश दिया कि 1 दिसंबर 2018 से 5 दिसंबर 2024 तक का संशोधित मासिक बिजली बिल वास्तविक मीटर रीडिंग या औसत खपत के आधार पर तैयार कर उपभोक्ता को दिया जाए तथा इस अवधि पर कोई विलंब शुल्क न लगाया जाए।
साथ ही उपभोक्ता द्वारा जमा की गई 1 लाख 10 हजार रुपये की राशि को समायोजित करने और संशोधित बिल जारी होने तक बिजली आपूर्ति बाधित न करने का आदेश भी दिया गया है।
मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना को गंभीर मानते हुए आयोग ने बिजली विभाग को 25 हजार रुपये मुआवजा और 5 हजार रुपये वाद व्यय देने का आदेश दिया है तथा यह भी स्पष्ट किया है कि 45 दिनों में अनुपालन न होने पर राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लागू होगा।














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