इंदौर, 12 मई।
मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित बहुचर्चित भोजशाला प्रकरण में मंगलवार को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में अंतिम सुनवाई पूरी हो गई। करीब दो घंटे से अधिक चली बहस के बाद अदालत ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। अब पूरे मामले में न्यायालय के अंतिम फैसले पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हुई हैं, जो यह तय करेगा कि ऐतिहासिक परिसर का धार्मिक स्वरूप और अधिकार किसके पास रहेगा।
सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने मजबूत दलीलें पेश करते हुए कहा कि अब तक यह वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह स्थल मंदिर है, मस्जिद है या जैन शाला। उनका कहना था कि यदि यह मंदिर होता तो मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा से जुड़े प्रमाण अवश्य मिलते, लेकिन ऐसे साक्ष्य अनुपलब्ध हैं। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि किसी स्थान का धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल न्यायालय को है, न कि संविधान के तहत दायर याचिका पर उच्च न्यायालय को।
मुस्लिम पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की 98 दिनों की रिपोर्ट पर भी गंभीर सवाल उठाए। दलील दी गई कि सर्वे के दौरान गौतम बुद्ध की प्रतिमा मिलने की बात सामने आई, लेकिन इसे रिपोर्ट में शामिल नहीं किया गया। साथ ही कार्बन डेटिंग तकनीक का उपयोग न करने पर भी आपत्ति जताई गई। यह भी आरोप लगाया गया कि सर्वे की औपचारिक सूचना पक्षकारों को नहीं दी गई, जबकि आधुनिक तकनीक के बजाय पुरानी पद्धति अपनाई गई, जिससे निष्कर्षों की स्पष्टता पर सवाल खड़े होते हैं।
दूसरी ओर, हिंदू पक्ष ने अपने तर्कों में वैज्ञानिक सर्वे और ऐतिहासिक प्रमाणों का हवाला देते हुए भोजशाला को वाग्देवी अर्थात सरस्वती मंदिर बताया है और परिसर पर अधिकार की मांग की है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने भी अपनी रिपोर्ट को अदालत में मजबूती से प्रस्तुत किया है।
गौरतलब है कि यह विवाद वर्ष 2022 में दायर याचिका के बाद फिर से चर्चा में आया था, जिसके बाद वर्ष 2024 में अदालत के आदेश पर विस्तृत वैज्ञानिक सर्वे किया गया। इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2026 में वसंत पंचमी के अवसर पर परिसर में पूजा-अर्चना की विशेष अनुमति भी दी थी। अब दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद न्यायालय ने निर्णय सुरक्षित रख लिया है।



.jpg)




.jpg)



