मध्य प्रदेश में सादगी की अपील के बावजूद होर्डिंग और पोस्टरों की भरमार से उठे विरोधाभास और प्रशासनिक कार्रवाई पर गंभीर सवाल सामने आए हैं।
07 मई।
मध्य प्रदेश की राजनीति इन दिनों एक ऐसे विरोधाभास का मंच बन गई है, जहां शब्द और व्यवहार आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल सादगी, संयम और “नो-शो ऑफ” राजनीति का संदेश देते हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्हीं के संगठन से जुड़े नव-नियुक्त पदाधिकारी राजधानी से लेकर छोटे शहरों तक होर्डिंग, पोस्टर और फ्लेक्स की बाढ़ ला चुके हैं। सवाल सीधा है—क्या यह अपील केवल भाषणों तक सीमित थी?
“सादगी” का नारा या सिर्फ औपचारिकता? राजनीतिक अपीलों की असली परीक्षा ज़मीन पर होती है, न कि मंचों पर। अगर प्रदेश अध्यक्ष की बातों में वजन होता, तो क्या शहरों के चौराहे इस तरह पोस्टरों से पट जाते? हर गली, हर बिजली के खंभे पर लटकते चेहरे यह साफ संकेत दे रहे हैं कि संगठन के भीतर अनुशासन या तो कमजोर है या फिर जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है।
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा सवालिया भूमिका नगर निगम और जिला प्रशासन की है। आम नागरिक या कोई निजी संस्था यदि बिना अनुमति एक छोटा सा पोस्टर भी लगा दे, तो तुरंत कार्रवाई होती है—जुर्माना, जब्ती और चेतावनी। लेकिन जब बात राजनीतिक होर्डिंग्स की आती है, तो वही प्रशासन आंखों पर पट्टी बांधकर बैठ जाता है। यह दोहरा रवैया व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है।
इन बड़े-बड़े फ्लेक्स और होर्डिंग्स का सबसे खतरनाक पहलू जनसुरक्षा पर इसका असर है। ट्रैफिक सिग्नल तक ढक जाना, मोड़ों पर दृश्यता खत्म होना—ये दुर्घटनाओं को न्योता देने के बराबर है। आंधी-तूफान में इनके गिरने की घटनाएं इसे और गंभीर बनाती हैं।
स्थिति अब केवल आलोचना से आगे बढ़ चुकी है। अगर वास्तव में “दिखावे की राजनीति” खत्म करनी है, तो बिना भेदभाव सभी अवैध होर्डिंग्स पर कार्रवाई जरूरी है। नेतृत्व को अपनी बातों को ज़मीन पर उतारना होगा, वरना अपील मंच पर और दिखावा सड़कों पर ही नजर आता रहेगा।