शहर को भिखारी मुक्त घोषित करने के सरकारी दावे और प्रमुख चौराहों पर भिक्षावृत्ति की वास्तविक स्थिति के बीच बढ़ते अंतर, साथ ही इससे जुड़ी प्रशासनिक लापरवाही और शहरी व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया गया है।
07 मई।
राजधानी को “भिखारी मुक्त” घोषित करने का दावा जितना आकर्षक था, उतना ही खोखला आज सड़कों पर दिखाई देता है। कुछ साल पहले जिला प्रशासन ने बड़े गर्व से यह घोषणा की थी कि भोपाल में भिक्षावृत्ति पर प्रभावी रोक लगा दी गई है, लेकिन आज यदि कोई आम नागरिक सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक शहर के प्रमुख चौराहों का दौरा करे, तो यह दावा हवा-हवाई साबित होता नजर आता है। बोर्ड ऑफिस, रोशनपुरा, चार इमली, जहांगीराबाद और पॉलिटेक्निक जैसे प्रमुख चौराहों पर भिक्षा मांगते, कांच ठोकते, खिलौने बेचते और दया की गुहार लगाते लोग आसानी से दिखाई देते हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह केवल भिक्षावृत्ति का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह सड़क सुरक्षा और शहरी प्रबंधन की विफलता का गंभीर उदाहरण बन चुका है। तेज रफ्तार वाहनों के बीच छोटे-छोटे बच्चों और महिलाओं का सड़कों पर दौड़ना, वाहनों के पास जाकर हाथ फैलाना या सामान बेचने की कोशिश करना सीधे तौर पर दुर्घटनाओं को न्योता देना है। लेकिन इस खतरे को न नगर निगम देख रहा है, न जिला प्रशासन और न ही यातायात पुलिस।
विडंबना यह है कि जहां एक ओर यातायात पुलिस वाहन चेकिंग में व्यस्त रहती है, वहीं ठीक उनके सामने भिक्षावृत्ति और अवैध गतिविधियां बेखौफ जारी रहती हैं। सवाल यह है कि क्या यह सब सचमुच नजर नहीं आता या फिर जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है।
जरूरत केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि ठोस और निरंतर कार्रवाई की है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि चौराहों पर सक्रिय लोग कौन हैं, कहां से आए हैं और क्या इनके पीछे कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा है। वास्तविक जरूरतमंदों के पुनर्वास और अवैध गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई के बिना “भिखारी मुक्त” जैसे दावे केवल कागज़ों तक सीमित रहेंगे।