इंदौर, 10 अप्रैल 2026।
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला विवाद मामले पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में शुक्रवार को लगातार पांचवें दिन सुनवाई जारी रही। सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने ऐतिहासिक साक्ष्यों, प्राचीन ग्रंथों और शिल्पकला के आधार पर अपनी दलीलें पेश कीं।
हिंदू पक्षकारों ने कोर्ट में तर्क दिया कि भोजशाला केवल एक संरचना नहीं बल्कि मां सरस्वती को समर्पित एक प्राचीन मंदिर एवं संस्कृत शिक्षा का केंद्र था। उन्होंने कहा कि इस स्थल का उल्लेख विभिन्न प्राचीन ग्रंथों, ब्रिटिश कालीन गजेटियर तथा राजा भोज से जुड़े ग्रंथों में मिलता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद द्वारा व्यस्तता के चलते सुनवाई को 28 अप्रैल तक स्थगित करने की मांग की गई, जिसे अदालत ने अस्वीकार करते हुए नियमित रूप से प्रतिदिन सुनवाई जारी रखने का आदेश दिया।
दूसरी याचिका की सुनवाई के दौरान लखनऊ निवासी याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि राजा भोज रचित ग्रंथ ‘समरांग सूत्रधार’ में नगर नियोजन और मंदिर निर्माण वास्तुकला का विस्तृत वर्णन मिलता है।
उन्होंने कहा कि भोजशाला की संरचना, स्तंभों की बनावट, आयाम और मूर्तिकला शैली इस ग्रंथ में वर्णित सिद्धांतों से मेल खाती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह स्थान मूल रूप से एक मंदिर था। साथ ही 1304 ईस्वी के ‘चिंतामणि’, 19वीं सदी के धार गजेटियर और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों का भी उल्लेख किया गया।
सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि एएसआई खुदाई में मिली ब्रह्माजी की दुर्लभ मूर्ति का स्वरूप ‘समरांग सूत्रधार’ में वर्णित ब्रह्मा प्रतिमा से मेल खाता है। इसके अलावा हिंगलाजगढ़, मंदसौर और रायसेन की मूर्तिकला परंपरा से भी समानताएं बताई गईं।
हिंदू पक्ष ने तर्क दिया कि परमार कालीन स्थापत्य शैली और उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर की वास्तुकला में भी समान संरचनात्मक विशेषताएं देखने को मिलती हैं।
मामले की अगली सुनवाई 15 अप्रैल को निर्धारित की गई है, जिसमें हिंदू पक्ष अपने तर्कों को और विस्तार से प्रस्तुत करेगा।


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