चेन्नई, 06 मई।
तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया में एआई (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस)को अपनाने की होड़ अब कंपनियों के लिए नई मुश्किलें खड़ी करती नजर आ रही है। काम को आसान और तेज बनाने के उद्देश्य से एआई का तेजी से उपयोग किया जा रहा है, लेकिन इस दौड़ में कई कंपनियां अपनी बुनियादी साइबर सुरक्षा को नजरअंदाज कर रही हैं।
हालिया रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियों के पास मजबूत सुरक्षा ढांचे की कमी साफ दिखाई दे रही है, जिससे साइबर हमलों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। यह जानकारी जोहो कारपोरेशन की ‘स्टेट ऑफ वर्कफोर्स पासवर्ड सिक्योरिटी रिपोर्ट-2026’ में सामने आई है। रिपोर्ट बताती है कि भारत के 93 प्रतिशत संगठन यह मानते हैं कि एआई उनके सिस्टम को अधिक सुरक्षित बनाएगा, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। बड़ी संख्या में कंपनियां अब भी आधुनिक सुरक्षा ढांचे को लागू नहीं कर पाई हैं। विशेष रूप से जीरो ट्रस्ट फ्रेमवर्क जैसे महत्वपूर्ण सिस्टम को अपनाने में गंभीर कमी देखी गई है।
जीरो ट्रस्ट फ्रेमवर्क का मतलब है कि किसी भी यूजर या सिस्टम पर बिना जांच के भरोसा न किया जाए और हर स्तर पर कड़ी सुरक्षा जांच लागू हो। इस प्रणाली के अभाव में साइबर अपराधियों के लिए कंपनियों के डेटा तक पहुंच बनाना आसान हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कंपनियां केवल एआई पर निर्भर रहकर सुरक्षा उपायों की अनदेखी करती रहीं, तो आने वाले समय में बड़े साइबर हमले और डेटा चोरी की घटनाएं बढ़ सकती हैं। ऐसे में तकनीक के साथ-साथ मजबूत सुरक्षा ढांचे को अपनाना भी उतना ही जरूरी हो गया है।
भारतीय कंपनियां साइबर हमलों से बचने के लिए क्या कर रहीं?
टिगॉन एडवायजरी कॉर्प की तरफ से जोहो वॉल्ट के लिए दुनिया भर में किए गए इस विस्तृत वैश्विक सर्वे में एक बहुत बड़ा अंतर सामने आया है। यह अंतर भारतीय कंपनियों के सुरक्षा को लेकर उनके अति-आत्मविश्वास और उनकी असली तैयारियों के बीच का है। रिपोर्ट के अनुसार, 98 प्रतिशत भारतीय कंपनियां एआई पर आधारित नए सुरक्षा टूल्स को अपनाने की जोरदार योजना बना रही हैं। इसमें से 76 प्रतिशत कंपनियों का सबसे पहला ध्यान 'रियल-टाइम थ्रेट डिटेक्शन और रिस्पॉन्स' पर लगा हुआ है। इसका मतलब यह है कि वे ऐसी आधुनिक तकनीक चाहती हैं जो किसी भी साइबर खतरे को तुरंत पहचान ले और उसी वक्त उसका करारा जवाब भी दे सके।
कंपनियों के लिए तकनीक पहले, सुरक्षा बाद में
सुरक्षा उपायों को बेहतर बनाने की इस तेज दौड़ में 56 प्रतिशत कंपनियों का ध्यान 'यूजर बिहेवियर एनालिटिक्स' पर है, यानी वे यह गहराई से समझना चाहती हैं कि सिस्टम का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति किस तरह का व्यवहार कर रहा है। वहीं, 55 प्रतिशत कंपनियां जोखिम पर आधारित 'एक्सेस कंट्रोल ऑटोमेशन' पर फोकस कर रही हैं, जिससे उनकी पूरी सुरक्षा व्यवस्था अपने आप बिना किसी इंसानी मदद के काम कर सके। लेकिन, इस पूरी अत्याधुनिक योजना में सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इन तकनीकों को अपनाने की चाहत तो बहुत है, लेकिन कंपनियों की जो सबसे बुनियादी सुरक्षा स्थिति है, वह अभी भी बहुत कमजोर बनी हुई है।
कंपनियां पहले ही हो चुकी साइबर हमलों का शिकार?
इस रिपोर्ट में एक और बहुत ही डराने वाला और कड़वा सच सामने आया है। सर्वे में यह स्पष्ट पता चला है कि लगभग 47 प्रतिशत कंपनियां पहले ही किसी न किसी तरह के गंभीर साइबर हमलों का शिकार हो चुकी हैं। सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह है कि इन कंपनियों को सबसे बड़ा खतरा किसी बाहरी हैकर या दुश्मन से नहीं, बल्कि 'इनसाइडर थ्रेट' यानी अपने ही अंदरूनी लोगों से है।








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