बढ़ती हवाई यात्रा मांग के बावजूद महंगे विमान ईंधन, भारी कर ढांचे और बढ़ती परिचालन लागत के कारण विमानन क्षेत्र गंभीर आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है।
06 मई।
भारत में विमानन क्षेत्र लंबे समय से चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ हवाई यात्रा की मांग लगातार बढ़ रही है, तो दूसरी ओर विमान कंपनियाँ बढ़ती लागत, कर व्यवस्था और नीतिगत दबावों से जूझ रही हैं। यह विरोधाभास बताता है कि समस्या केवल बाज़ार की नहीं, बल्कि संरचनात्मक है, जिसे समय रहते समझने और सुधारने की आवश्यकता है।
बीते वर्षों में देश में मध्यम वर्ग के विस्तार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजनाओं के कारण हवाई यात्रा आम लोगों तक पहुँची है। छोटे शहरों को जोड़ने की कोशिशों ने इस क्षेत्र में नई ऊर्जा भरी है। लेकिन इसके साथ ही लागत का बोझ भी बढ़ा है, जो विमान कंपनियों के लिए टिकाऊ नहीं रह गया है। सबसे बड़ा कारण है एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ की ऊँची कीमत और उस पर लगने वाले भारी कर।
भारत में एटीएफ की कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में अधिक रहती हैं। इसका कारण केवल वैश्विक बाजार नहीं, बल्कि घरेलू कर संरचना भी है। विभिन्न राज्यों द्वारा लगाए गए वैट और केंद्र के कर मिलकर इसे और महँगा बना देते हैं। परिणाम यह होता है कि विमान कंपनियों की परिचालन लागत का बड़ा हिस्सा केवल ईंधन पर खर्च होता है। जब लागत इतनी अधिक हो, तो टिकट कीमतों को नियंत्रित रखना कठिन हो जाता है।
इसके साथ ही रुपया कमजोर होने पर स्थिति और बिगड़ जाती है, क्योंकि ईंधन का आयात डॉलर में होता है। ऐसे में हर गिरावट सीधे कंपनियों की जेब पर असर डालती है। कई बार कंपनियाँ घाटे में भी उड़ानें जारी रखने को मजबूर होती हैं, क्योंकि प्रतिस्पर्धा इतनी तीव्र है कि किराए बढ़ाने का विकल्प सीमित हो जाता है।
विमानन क्षेत्र की एक और बड़ी समस्या है करों की जटिलता। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और घरेलू उड़ानों के लिए अलग-अलग कर नियम हैं, जिससे संचालन में कठिनाई आती है। कई विशेषज्ञ लंबे समय से यह मांग करते रहे हैं कि एटीएफ को वस्तु एवं सेवा कर के दायरे में लाया जाए, ताकि करों का बोझ कम हो और एक समान नीति लागू हो सके। लेकिन अब तक इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
दूसरी ओर, हवाई अड्डों के उपयोग शुल्क, मेंटेनेंस लागत और लीज पर लिए गए विमानों के भुगतान जैसी अन्य खर्चे भी लगातार बढ़ रहे हैं। यह सब मिलकर कंपनियों के लिए एक ऐसा दबाव बनाते हैं, जिससे निकलना आसान नहीं होता। कई कंपनियाँ दिवालिया हो चुकी हैं या पुनर्गठन की प्रक्रिया से गुजर रही हैं। यह केवल कंपनियों की विफलता नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की कमजोरी को दर्शाता है।
सरकार ने क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना जैसे प्रयासों से इस क्षेत्र को बढ़ावा देने की कोशिश की है, लेकिन केवल नई उड़ानें शुरू कर देना पर्याप्त नहीं है। यदि कंपनियों की वित्तीय स्थिति मजबूत नहीं होगी, तो ये योजनाएँ भी लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह पाएंगी। जरूरत है कि नीति निर्माण में लागत और व्यवहार्यता दोनों को संतुलित किया जाए।
विमानन क्षेत्र केवल यात्रा का माध्यम नहीं, बल्कि आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण इंजन भी है। यह पर्यटन, व्यापार और निवेश को बढ़ावा देता है। यदि यह क्षेत्र कमजोर होता है, तो इसका असर व्यापक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए इसे केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखा जाना चाहिए।
समाधान स्पष्ट है, लेकिन इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। सबसे पहले एटीएफ पर करों को तर्कसंगत बनाना होगा। इसे जीएसटी के दायरे में लाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इसके अलावा, हवाई अड्डा शुल्क और अन्य परिचालन लागतों की समीक्षा भी जरूरी है। नीति में स्थिरता और पारदर्शिता लाकर कंपनियों को दीर्घकालिक योजना बनाने का अवसर देना होगा।
यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो यह क्षेत्र बार-बार संकट में फंसता रहेगा। हवाई यात्रा की बढ़ती मांग के बावजूद यदि कंपनियाँ टिक नहीं पातीं, तो इसका सीधा असर यात्रियों पर पड़ेगा। महंगे टिकट, सीमित विकल्प और सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट जैसी समस्याएँ सामने आ सकती हैं।
यह समय है जब सरकार, उद्योग और नियामक संस्थाएँ मिलकर एक संतुलित और दूरदर्शी नीति तैयार करें। विमान कंपनियों की मजबूती केवल उनके अस्तित्व का सवाल नहीं, बल्कि देश के आर्थिक भविष्य से जुड़ा हुआ मुद्दा है।