काठमांडू, 01 जून।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह द्वारा संसद में सीमा विवाद से जुड़े मुद्दे पर दिए गए बयान को लेकर छात्र संगठनों का विरोध तेज हो गया है। देश के 10 छात्र संगठनों ने संयुक्त रूप से प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताते हुए उनसे बयान वापस लेने और सार्वजनिक रूप से क्षमा मांगने की मांग की है।
विभिन्न छात्र संगठनों के पदाधिकारियों ने सोमवार को जारी साझा वक्तव्य में कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल है। उन्होंने इसे राष्ट्रविरोधी, आत्मसमर्पणवादी और देश के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ बताया। संगठनों का कहना है कि इस प्रकार के बयान से राष्ट्रीय भावना को ठेस पहुंचती है।
छात्र नेताओं ने कहा कि यह टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है, जब नेपाल लगातार लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा समेत कुछ क्षेत्रों पर अपना दावा जताता रहा है। ऐसे संवेदनशील विषय पर प्रधानमंत्री का वक्तव्य गंभीर चिंता का विषय है।
संयुक्त बयान में कहा गया कि देश की संप्रभुता, स्वतंत्रता और भौगोलिक अखंडता से जुड़े मुद्दों पर किसी भी प्रकार की कमजोर पड़ने वाली टिप्पणी स्वीकार्य नहीं हो सकती। छात्र संगठनों के अनुसार इसे सामान्य चूक नहीं माना जा सकता, बल्कि यह राष्ट्रीय हितों के विपरीत एक राजनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
संगठनों ने चेतावनी भी दी कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो छात्र, युवा और राष्ट्रहित से जुड़े नागरिक व्यापक स्तर पर विरोध आंदोलन को और तेज करेंगे। उनका कहना है कि राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़े विषयों पर किसी भी समझौते का विरोध किया जाएगा।
यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में सामने आई है, जब प्रधानमंत्री के संसदीय वक्तव्य को लेकर राजनीतिक दलों, संवैधानिक जानकारों और नागरिक समाज के विभिन्न वर्गों की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। सीमा विवाद से जुड़े इस बयान पर देश में बहस का दौर जारी है।
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने रविवार को संसद में कहा था कि पदभार संभालने के बाद उन्हें यह जानकारी मिली कि केवल भारत ही नहीं, बल्कि नेपाल ने भी कुछ स्थानों पर भारत की भूमि पर कब्जा कर रखा है।











