12 मई।
मध्यप्रदेश में लंबे समय से चल रहे कुपोषण उन्मूलन अभियानों और सरकारी दावों के बीच जमीनी हकीकत चिंताजनक बनी हुई है, जहां योजनाओं के प्रचार और कागजी रिपोर्टों के विपरीत बच्चों में गंभीर कुपोषण और उससे जुड़ी समस्याएं लगातार सामने आ रही हैं, जिससे पूरी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
राज्य में विभिन्न मंचों से “कुपोषण मुक्त प्रदेश” के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति गांवों और आदिवासी क्षेत्रों में बेहद गंभीर दिखाई देती है, जहां गरीब परिवारों के बच्चे पर्याप्त पोषण से वंचित हैं और सरकारी योजनाएं केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बढ़ती महंगाई के दौर में मात्र 8 रुपये प्रतिदिन की सहायता से बच्चों को संतुलित आहार कैसे दिया जा सकता है, जबकि आवश्यक पोषक आहार की लागत इससे कई गुना अधिक है और वास्तविक जरूरतों के अनुसार यह राशि पूरी तरह अपर्याप्त मानी जा रही है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर संभागों में पिछले वर्षों में लाखों बच्चे कुपोषण से प्रभावित हुए हैं, जिनमें बड़ी संख्या गंभीर श्रेणी में शामिल है, साथ ही हजारों संभावित मौतों के आंकड़े भी सामने आए हैं, जिससे स्थिति की गंभीरता स्पष्ट होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 8 रुपये की पुरानी दर वर्षों से अपरिवर्तित बनी हुई है, जबकि महंगाई कई गुना बढ़ चुकी है, और ऐसे में यह व्यवस्था केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित होकर रह गई है, जिससे वास्तविक लाभ बच्चों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
महिला एवं बाल विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि आंगनबाड़ियों और पोषण केंद्रों की निगरानी कमजोर मानी जा रही है और कई स्थानों पर गुणवत्ता तथा नियमित वितरण की समस्या सामने आ रही है, जिससे व्यवस्था की गंभीर खामियां उजागर हो रही हैं।






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