संपादकीय
12 May, 2026

मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता की दस्तक: “एक देश–एक कानून” की दिशा में बढ़ता नया कदम

मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में सरकार द्वारा उच्च स्तरीय समिति गठन और कानूनी ढांचा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू होने से सामाजिक और संवैधानिक बहस को नई गति मिली है।

12 मई।
भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर वर्षों से चल रही बहस अब नई दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। उत्तराखंड और गुजरात के बाद अब मध्य प्रदेश भी समान नागरिक संहिता लागू करने की तैयारी में तेजी से जुट गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर राज्य सरकार ने उच्च स्तरीय समिति का गठन कर इस दिशा में औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। यदि सब कुछ तय समय के अनुसार आगे बढ़ता है, तो मध्य प्रदेश यूसीसी लागू करने वाला देश का तीसरा राज्य बन सकता है।
राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से यह कदम केवल कानूनी सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, समान अधिकार और प्रशासनिक सरलता की दिशा में बड़ा परिवर्तन माना जा रहा है। राज्य सरकार इसे “हम सब बराबर, हमारे अधिकार बराबर” की भावना से जोड़कर देख रही है।
समान नागरिक संहिता का अर्थ है कि विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, गोद लेना और पारिवारिक विवादों जैसे मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू हो। वर्तमान में भारत में अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं। यानी हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख और अन्य समुदायों के पारिवारिक मामलों के लिए अलग कानूनी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। यूसीसी का उद्देश्य इन विभिन्न व्यवस्थाओं को एक समान कानूनी ढांचे में लाना है, ताकि सभी नागरिकों को समान अधिकार और न्याय मिल सके। संविधान के अनुच्छेद 44 में भी राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है।
मध्य प्रदेश सरकार ने यूसीसी का मसौदा तैयार करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित की है। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई को सौंपी गई है। समिति में प्रशासनिक, कानूनी, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। समिति के प्रमुख सदस्यों में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह, विधि विशेषज्ञ अनूप नायर, शिक्षाविद् गोपाल शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता कृष्णपाल सिंह शामिल हैं। समिति के सचिव के रूप में उप सचिव अजय कटेसरिया को जिम्मेदारी दी गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं इस प्रक्रिया की समीक्षा कर चुके हैं और मुख्य सचिव को समिति के साथ समन्वय स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं। बताया जा रहा है कि समिति को 60 दिनों के भीतर प्रारंभिक प्रक्रियाओं और अध्ययन को पूरा करना होगा।
मध्य प्रदेश सरकार उत्तराखंड और गुजरात में लागू यूसीसी मॉडल का गहन अध्ययन कर रही है। उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना जिसने समान नागरिक संहिता लागू की। इसके बाद गुजरात ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए। अब मध्य प्रदेश इन राज्यों के कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक अनुभवों को समझकर अपने राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप कानून तैयार करना चाहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य प्रदेश की सामाजिक विविधता और भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए यहां विशेष रूप से संतुलित और व्यावहारिक मॉडल तैयार करना होगा।
मध्य प्रदेश की आबादी का बड़ा हिस्सा आदिवासी समुदायों से जुड़ा है। ऐसे में सरकार आदिवासी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने पर विशेष ध्यान दे रही है। सूत्रों के अनुसार आदिवासी समुदायों को यूसीसी में 50 से 70 प्रतिशत तक विशेष छूट दिए जाने पर विचार किया जा सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उनकी परंपराएं, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। यह पहल इस बात का संकेत है कि सरकार समानता और सांस्कृतिक संरक्षण दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
यदि मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू होती है, तो विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण, गोद लेने और लाइव-इन रिलेशनशिप जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। सरकार का मानना है कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण कई बार कानूनी असमानता और भ्रम की स्थिति पैदा होती है। यूसीसी के माध्यम से इन विसंगतियों को समाप्त कर सभी नागरिकों को समान न्याय देने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि, मध्य प्रदेश जैसे विविधताओं वाले राज्य में सभी वर्गों का विश्वास जीतना बड़ी चुनौती होगी। धार्मिक संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और विभिन्न समुदायों के सुझावों तथा आपत्तियों को गंभीरता से सुनना होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यदि मध्य प्रदेश में यूसीसी लागू होता है, तो इसका प्रभाव केवल राज्य तक सीमित नहीं रहेगा। यह देश के अन्य राज्यों में भी समान नागरिक संहिता को लेकर नई बहस और राजनीतिक गतिविधियों को गति दे सकता है। यदि यह कानून संतुलित, व्यावहारिक और सभी समुदायों की भावनाओं का सम्मान करते हुए लागू किया जाता है, तो यह सामाजिक समरसता और समानता की दिशा में ऐतिहासिक पहल साबित हो सकता है। 
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