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15 May, 2026

पिछोर का 2.5 अरब वर्ष पुराना ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट बना वैज्ञानिक धरोहर, अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने की पुष्टि

शिवपुरी जिले के पिछोर स्थित दुर्लभ ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट को भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल घोषित किए जाने के साथ एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इसे लगभग 2.5 अरब वर्ष पुराना बताते हुए इसके वैश्विक वैज्ञानिक महत्व की पुष्टि की है।

वाराणसी, 15 मई।

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के पिछोर क्षेत्र में स्थित दुर्लभ ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट अब देश और दुनिया में वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल के रूप में उभरकर सामने आया है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने इस अनोखी चट्टान संरचना को राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल का दर्जा प्रदान किया है।

एक नए अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययन में इसकी प्राचीनता और भूवैज्ञानिक महत्त्व को प्रमाणित किया गया है, जिसमें बताया गया है कि यह संरचना लगभग ढाई अरब वर्ष पुरानी है। इस अध्ययन के बाद इसके वैश्विक वैज्ञानिक महत्व को और अधिक मजबूती मिली है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के जनसंपर्क कार्यालय के अनुसार, बीते वर्ष एक अंतरराष्ट्रीय दिवस के अवसर पर इस स्थल को संरक्षित भू-विरासत स्थल घोषित करने की प्रक्रिया को औपचारिक रूप दिया गया था, जिसमें भारत के साथ एक अन्य भूवैज्ञानिक स्थल को भी शामिल किया गया था।

वर्ष 2025 में प्रकाशित शोध में रेडियोमेट्रिक डेटिंग और समस्थानिक विश्लेषण के आधार पर यह स्थापित किया गया कि पिछोर की यह चट्टान संरचना अत्यंत प्राचीन है और बुंदेलखंड क्रैटन के नियोआर्कियन मैग्माटिक इतिहास से जुड़ी हुई है।

इस शोध का नेतृत्व भूविज्ञान विभाग के एक प्रमुख वैज्ञानिक ने किया, जिसमें भारत और विदेश के कई शोधकर्ता शामिल रहे। यह अध्ययन भारत-ब्राजील वैज्ञानिक सहयोग के अंतर्गत संपन्न हुआ, जिससे इस स्थल की अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक प्रासंगिकता और बढ़ गई है।

वैज्ञानिकों के अनुसार यह चट्टान अपनी गोलाकार खनिजीय परतों के लिए जानी जाती है, जिन्हें ऑर्बिकल्स कहा जाता है, और ये अत्यंत दुर्लभ भूवैज्ञानिक संरचनाएं हैं। दुनिया में इनके बहुत सीमित उदाहरण पाए जाते हैं।

नवीन अध्ययन में इन संरचनाओं को विशुद्ध अग्निज और फेल्सिक प्रकृति का बताया गया है, जो विशेष प्रकार के मैग्मा से निर्मित हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थल पृथ्वी के प्राचीन भू-पटल विकास का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

इस क्षेत्र को अब औपचारिक संरक्षण मिलने की संभावना है, जिससे भू-विज्ञान अनुसंधान, शिक्षा और भू-पर्यटन को नई दिशा मिलेगी और मध्य भारत का यह क्षेत्र वैज्ञानिक मानचित्र पर और अधिक सशक्त रूप से उभरेगा।

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