संपादकीय
10 Apr, 2026

रक्तरंजित रेत और प्रशासन मौन कब रुकेगा माफिया राज

मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में अवैध रेत खनन माफिया का आतंक बढ़ता जा रहा है। लगातार हमलों से कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

10 अप्रैल।
मध्य प्रदेश, विशेषकर ग्वालियर-चंबल अंचल, एक बार फिर उसी कड़वी सच्चाई के सामने खड़ा है, जहां कानून का पालन कराने वाले ही कानूनहीनता के शिकार बन रहे हैं। अवैध खनन, खासकर रेत माफिया का आतंक, अब केवल आर्थिक अपराध नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे-सीधे राज्य की कानून-व्यवस्था और शासन की साख को चुनौती दे रहा है। सवाल यह है कि आखिर कब तक वर्दीधारी और वनकर्मी अपनी जान गंवाते रहेंगे और सत्ता मौन दर्शक बनी रहेगी।
इतिहास के पन्ने पलटें तो घटनाएं किसी एक समय की नहीं, बल्कि एक भयावह सिलसिले की तरह सामने आती हैं। आईपीएस अधिकारी नरेंद्र सिंह की 2012 में खनन माफिया द्वारा ट्रैक्टर से कुचलकर हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इसके बाद 2015 में मुरैना में प्रधान आरक्षक धर्मेंद्र चौहान की डंपर से कुचलकर हत्या, 2018 में सराय छोला थाने पर हमला और फायरिंग, तथा उसी वर्ष डिप्टी रेंजर सुविधा सिंह कुशवाहा की हत्या—ये सभी घटनाएं बताती हैं कि माफियाओं के हौसले किस कदर बुलंद हैं। 2021 में वन अधिकारी श्रद्धा भंडारे पर लगातार हमले और 2025 में सबलगढ़ क्षेत्र में वन विभाग की टीम पर फायरिंग और पथराव की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है, बल्कि अपराधियों का दुस्साहस और बढ़ा है। यह केवल अपराध नहीं, बल्कि शासन के प्रति खुली बगावत है।
कुछ जनप्रतिनिधियों द्वारा “रेत माफिया” को “पेट माफिया” बताना न केवल संवेदनहीनता का परिचायक है, बल्कि यह अपराध को वैधता देने जैसा है। पेट की भूख कभी भी कानून को रौंदने, हत्या करने और सरकारी तंत्र पर हमला करने का औचित्य नहीं बन सकती। यह तर्क उन परिवारों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को कर्तव्य निभाते हुए खो दिया।
मुरैना के दिमनी क्षेत्र में हालिया घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या केवल ड्राइवर पर मामला दर्ज कर देना पर्याप्त है? क्या वह असली अपराधी है या केवल एक मोहरा? यदि मृतक के परिजन खुलेआम नाम ले रहे हैं, तो फिर प्रशासन की चुप्पी क्यों? आखिर 20 घंटे बाद भी ट्रैक्टर मालिक की पहचान न होना क्या दर्शाता है—क्या यह अक्षमता है या मिलीभगत?
यह भी विचारणीय है कि जब पुलिस और वन विभाग के कर्मचारियों के हाथ ही बंधे हों, तो वे अपराध पर नियंत्रण कैसे पाएंगे। यदि उन्हें राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक निष्क्रियता का सामना करना पड़े, तो उनका मनोबल टूटना स्वाभाविक है। ऐसे में अपराधियों के हौसले और बढ़ना तय है।
अन्य राज्यों में कानून-व्यवस्था पर बयान देने वाले नेताओं की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है? जब अपने ही राज्य में जंगलराज जैसी स्थिति बन रही हो, तो क्या जिम्मेदारी नहीं बनती कि सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई की जाए?
समाधान केवल बयानबाजी में नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई में है। अवैध खनन पर पूरी तरह अंकुश लगाने के लिए सख्त कानूनों का पालन, दोषियों पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई, तथा राजनीतिक संरक्षण की जांच अनिवार्य है। साथ ही, ईमानदार अधिकारियों को सुरक्षा और स्वतंत्रता देना भी उतना ही जरूरी है।
रक्तरंजित रेत की यह कहानी केवल अपराध की नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता की कहानी है। यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा और हर नई घटना केवल एक और आंकड़ा बनकर रह जाएगी। अब समय है कि सत्ता अपना मौन तोड़े और यह साबित करे कि कानून से ऊपर कोई नहीं—न माफिया, न उनका संरक्षक।
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