न्यायपालिका
07 Apr, 2026

धार्मिक आस्था बनाम मौलिक अधिकार: सबरीमाला मामले की सुनवाई

उच्चतम न्यायालय की नौ जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक आस्था बनाम मौलिक अधिकार मामले की सुनवाई शुरू की। सुनवाई 22 अप्रैल तक पूरी होगी।

नई दिल्ली, 07 अप्रैल। 

उच्चतम न्यायालय की नौ जजों वाली संविधान पीठ ने मंगलवार से सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक आस्था बनाम मौलिक अधिकार के मामले की सुनवाई शुरू कर दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में पीठ के समक्ष केंद्र सरकार ने हलफनामे में कहा कि माहवारी संबंधी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक धार्मिक आस्था और स्वायत्तता से जुड़ा मामला है।

केंद्र सरकार ने अदालत से इस प्रतिबंध को बनाए रखने की मांग की और कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा सीमित होनी चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि भारत ने हमेशा महिलाओं को बराबरी दी है और कई बार उन्हें ऊंचा स्थान भी प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि हालिया फैसलों में पितृसत्ता और जेंडर स्टीरियोटाइप शब्दों का उपयोग हुआ है, जो भारतीय सभ्यता का हिस्सा नहीं हैं और ये विचार बाहर से आए हैं।

मेहता ने यह भी कहा कि भारत ऐसा समाज है जहां महिलाओं को देवी स्वरूप पूजा जाता है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उच्चतम न्यायालय के जज सभी महिला देवियों के सामने नतमस्तक होते हैं, जो महिलाओं के प्रति सम्मान दर्शाता है।

सुनवाई में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस एजे मसीह, जस्टिस पीबी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं। अदालत ने पहले ही कहा है कि संविधान पीठ 22 अप्रैल तक सुनवाई पूरी करेगी। याचिकाकर्ता 7-9 अप्रैल को दलीलें रखेंगे, विरोधी पक्ष 14-16 अप्रैल को, फिर 21 अप्रैल को याचिकाकर्ताओं की दोबारा दलीलें और 22 अप्रैल को एमिकस क्यूरी की दलीलें पेश की जाएंगी।

28 सितंबर 2018 को उच्चतम न्यायालय ने 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया था। उस समय अदालत ने कहा था कि महिलाओं के साथ लंबे समय से भेदभाव होता रहा है। महिला पुरुष से कमतर नहीं है। महिलाओं को देवी स्वरूप माना जाता है, फिर भी भेदभाव होता है। कोर्ट ने कहा कि बायोलॉजिकल और फिजियोलॉजिकल कारणों से महिलाओं की धार्मिक स्वतंत्रता समाप्त नहीं होती। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा समेत चार जजों ने कहा कि यह संविधान की धारा 25 के तहत अधिकारों के खिलाफ है।

जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने अलग फैसला दिया। उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था के मामलों में कोर्ट का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। पूजा का तरीका मंदिर तय करे। धार्मिक प्रथाओं को समानता के अधिकार से पूरी तरह नहीं आंका जा सकता। यह पूजा करने वालों पर निर्भर करता है, न कि कोर्ट तय करे। मल्होत्रा ने कहा कि इस फैसले का असर अन्य मंदिरों पर भी पड़ेगा।

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