संपादकीय
06 May, 2026

सबको साधने की कवायद: निगम-मंडल नियुक्तियों में संतुलन की चुनौती, संगठन बनाम समीकरण

मध्य प्रदेश में निगम-मंडल नियुक्तियों को लेकर संगठनात्मक संतुलन साधने के प्रयासों के बीच पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी और राजनीतिक समीकरणों पर बहस तेज हो गई है।

06 मई।
सबको साधने की कवायद में अपने ही रूठ रहे हैं। संगठन के सामने एक सबसे बड़ी चुनौती है कि भाजपा कैडर के जमीनी कार्यकर्ताओं को कैसे यह समझाया जाए कि कल तक पानी पीकर भाजपा को कोसने वाले, भाजपा के विरोध में चुनाव लड़ने वाले और प्रचार करने वाले आज भाजपा सरकार में निगम-मंडल लेकर लाल बत्ती के दावेदार कैसे बन रहे हैं।
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों निगम-मंडलों और आयोगों में नियुक्तियों का दौर तेज हो गया है। सत्ता पक्ष भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इन नियुक्तियों के जरिए संगठनात्मक संतुलन साधने की कोशिश में नजर आ रही है, लेकिन इसके साथ ही कई तरह के विवाद और असंतोष भी सामने आ रहे हैं। खासतौर पर उन कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी देखी जा रही है, जिन्होंने वर्षों तक पार्टी के लिए जमीन पर काम किया, चुनावों में दिन-रात मेहनत की, लेकिन उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाया।
नियुक्तियों को लेकर सबसे बड़ा विवाद उन नामों को लेकर खड़ा हुआ है, जिन्हें कभी पार्टी से निष्कासित किया गया था या जो हाल के वर्षों में अन्य दलों से आकर भाजपा में शामिल हुए हैं। इनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक वे नेता भी शामिल हैं, जो पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) में थे और बाद में भाजपा में शामिल हुए। ऐसे नेताओं को निगम-मंडलों और आयोगों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने से पुराने और “जन्मजात भाजपाई” कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
भाजपा का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि पार्टी ने जिन कार्यकर्ताओं के दम पर वर्षों तक संघर्ष किया और सत्ता हासिल की, उन्हीं की उपेक्षा अब संगठन के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। यह वर्ग सवाल उठा रहा है कि क्या केवल राजनीतिक समीकरण साधने के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करना उचित है। संगठन की जड़ों को मजबूत करने वाले कार्यकर्ताओं की अनदेखी कहीं भविष्य में पार्टी की मजबूती को कमजोर न कर दे।
दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व इस पूरी प्रक्रिया को व्यापक रणनीति के तहत देख रहा है। भाजपा का प्रयास है कि विभिन्न गुटों, क्षेत्रों और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सभी को साथ लिया जाए। सबको साधने की इस कवायद में भाजपा के संगठन के दिग्गज नेता जुटे हुए हैं।
देखना यह होगा कि सभी को साथ रखकर संगठन को मजबूत करने और टूट से बचाने के लिए क्या रास्ता निकलता है।
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