संपादकीय
08 Jun, 2026

चौके-चूल्हे से कैबिनेट तक: लोकतंत्र का असली सम्मान

एक घरेलू कामगार से पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री बनीं कालिता माझी का संघर्षपूर्ण सफर भारतीय लोकतंत्र में आम आदमी की सत्ता में वास्तविक भागीदारी का एक अनूठा उदाहरण है।

आसनसोल, 08 जून।

कालिता माझी का सफर केवल एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सामाजिक परिपक्वता का प्रमाण है। घरों में काम करने वाली एक महिला का पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री बनना सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, बल्कि उस विचार का सम्मान है कि सत्ता के सर्वोच्च पदों तक पहुंचने का अधिकार हर नागरिक को है। जब आम आदमी ही खास कुर्सी पर बैठता है, तब राजनीति की परिभाषा बदलती है।

37 वर्षीय कालिता माझी, जो कभी दूसरों के घरों में बर्तन साफ करने और झाड़ू-पोंछा लगाने का काम करती थीं, आज पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री हैं। भाजपा ने उन्हें आसनसोल दक्षिण विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया और उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के एक प्रभावशाली नेता को 12,535 मतों से पराजित किया। इसके बाद उन्होंने मंत्री पद की शपथ ली। यह खबर केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक महत्व भी रखती है। यह कहानी आम आदमी को सम्मान देने के नारों से आगे बढ़कर उसे सत्ता में भागीदारी देने की मिसाल बन गई है।

कालिता का जीवन संघर्ष और उपलब्धि का उदाहरण है। पति और बेटे के साथ जीवनयापन के लिए वे घरों में सहायिका का काम करती थीं। राजनीति में आने से पहले उनका कोई राजनीतिक गॉडफादर नहीं था। 2021 में भाजपा ने उन्हें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित आसनसोल दक्षिण सीट से टिकट दिया। तब भी कई लोगों को उनकी सफलता पर संदेह था, लेकिन उन्होंने जीत दर्ज की। इस बार भी पार्टी ने उन पर भरोसा जताया और वे एक लाख से अधिक वोट हासिल कर दोबारा विधायक बनीं। अब मंत्री बनकर वे उन लाखों महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, जो सुबह दूसरों के घरों में काम करके शाम को अपने परिवार का चूल्हा जलाती हैं।

भारत में आम आदमी को टिकट देना कोई नई बात नहीं है, लेकिन अक्सर यह प्रतीकात्मक कदम साबित होता है। पंचायतों में सफाईकर्मी और विधानसभाओं में रिक्शा चालक को टिकट देकर राजनीतिक दल अपनी गरीब-हितैषी छवि पेश करते हैं, लेकिन जीत के बाद ऐसे प्रतिनिधि अक्सर हाशिए पर चले जाते हैं। कालिता माझी का मामला अलग है। भाजपा ने उन्हें पहली जीत के बाद भी महत्व दिया और दूसरी बार भी उम्मीदवार बनाया। इतना ही नहीं, उन्हें मंत्री बनाकर वास्तविक सत्ता में भागीदारी दी गई। यह संदेश है कि प्रतिभा और नेतृत्व क्षमता का संबंध केवल सामाजिक पृष्ठभूमि से नहीं होता।

यह घटना भारतीय लोकतंत्र की कई विशेषताओं को उजागर करती है। पहली, सामाजिक गतिशीलता। भारत में संविधान ने प्रत्येक नागरिक को चुनाव लड़ने और सत्ता तक पहुंचने का अधिकार दिया है। कालिता माझी ने साबित किया है कि यह अधिकार केवल कागज तक सीमित नहीं है। दूसरी, प्रतिनिधित्व का विस्तार। संसद और विधानसभाओं में वकील, डॉक्टर और व्यवसायी बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं, लेकिन घरेलू कामगार, मजदूर और किसान अपेक्षाकृत कम दिखते हैं। जब गरीबी और श्रम का अनुभव रखने वाला व्यक्ति नीति निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बनता है, तब योजनाओं में जमीनी वास्तविकताओं की झलक भी दिखाई देती है।

हालांकि मंत्री बनना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण मंत्री बने रहना और सफल प्रशासन देना है। सचिवालय की कार्यप्रणाली, फाइलों की जटिलता और अफसरशाही की प्रक्रियाएं उनके लिए नई होंगी। जनता परिणाम चाहती है और विरोधी उन्हें केवल प्रतीकात्मक चेहरा साबित करने की कोशिश करेंगे। ऐसे में उन्हें अपने काम से यह सिद्ध करना होगा कि वे केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि प्रभावी प्रशासक भी हैं।

कालिता माझी का मंत्री बनना केवल एक महिला की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह उस सोच की जीत है जो लोकतंत्र को कुलीन वर्गों का क्लब नहीं, बल्कि जनता की पंचायत मानती है। 1947 में भारत ने राजनीतिक लोकतंत्र हासिल किया था। आज कालिता जैसी कहानियां सामाजिक लोकतंत्र को मजबूत कर रही हैं। आम आदमी को सम्मान देने का अर्थ केवल मंच पर बुलाकर माला पहनाना नहीं, बल्कि उसे निर्णय लेने की जिम्मेदारी सौंपना है।

जब घरों में झाड़ू लगाने वाला हाथ शासन की फाइलों पर हस्ताक्षर करता है, तब लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ सामने आता है। कालिता माझी ने शपथ ले ली है। अब समाज की जिम्मेदारी है कि वह लोगों को उनकी पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि उनकी क्षमता, नीयत और कार्य से परखे। लोकतंत्र की सबसे सुंदर तस्वीर वही होती है, जहां संभावनाओं पर जन्म और परिस्थितियां हावी न हों। आज एक घरेलू कामगार मंत्री बनी है, कल कोई सफाईकर्मी मुख्यमंत्री भी बन सकता है। तभी कहा जा सकेगा कि भारतीय लोकतंत्र ने सचमुच आम आदमी को खास बना दिया है।

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