भोपाल, 08 जून।
आज के दौर में मीडिया की शक्ति निर्विवाद है। सरकारों की छवि निर्माण से लेकर जनमत को प्रभावित करने तक उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के उभार से लेकर अन्ना आंदोलन और उसके बाद अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक उदय तक मीडिया की भूमिका निस्संदेह महत्वपूर्ण रही है। शायद इसीलिए मीडिया से सामान्यतः कोई “पंगा” तब तक नहीं लेना चाहता, जब तक पानी सिर के ऊपर न निकल जाए।
फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का मीडिया ट्रायल हो या “ऑपरेशन सिंदूर” जैसी संवेदनशील सैन्य एवं राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं की अतिरंजित कवरेज, लगभग हर बार एक शब्द गूंजता है—“टीआरपी”। आखिर टीआरपी है क्या बला? और इस पूरे खेल का असली खलनायक कौन है?
मीडिया की “आन, बान और शान” के आकलन का प्रमुख बैरोमीटर टीआरपी है। टीआरपी अर्थात टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट किसी टीवी कार्यक्रम या चैनल की लोकप्रियता का मापदंड है। यह बताता है कि लक्षित दर्शकों में से कितने प्रतिशत लोग किसी विशेष कार्यक्रम या चैनल को देख रहे हैं।
सरल शब्दों में कहें तो टीआरपी मीडिया जगत की वह “मुद्रा” है, जिससे उसका बाजार भाव और रुतबा तय होता है। दूसरे शब्दों में, यह किसी व्यापारी के लिए बिक्री के आंकड़ों के महत्व के समान है।
किसी चैनल की टीआरपी जितनी अधिक होती है, विज्ञापनदाताओं से उसे उतने ही अधिक और महंगे विज्ञापन मिलते हैं। यही कारण है कि चैनलों के बीच दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने की निरंतर गला-काट प्रतिस्पर्धा रहती है, जो कई बार निम्न स्तर तक पहुंच जाती है।
टीआरपी केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है। अधिक दर्शक संख्या चैनल की राजनीतिक पहुंच और सामाजिक प्रभावशीलता भी बढ़ाती है। सत्ता, कॉरपोरेट जगत और रसूखदार तबके स्वाभाविक रूप से उन मंचों के निकट रहना चाहते हैं, जिनकी पहुंच जनता तक व्यापक हो। मीडिया संस्थानों को भी सत्ता और कॉरपोरेट जगत के करीब रहने से लाभ मिलता है, इसलिए वे उनके आसपास बने रहने का प्रयास करते हैं।
भारत में टीआरपी की गणना और प्रकाशन बीएआरसी (ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल) द्वारा किया जाता है। यह ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों का संयुक्त संगठन है। इसके लिए देशभर के चयनित घरों में विशेष उपकरण (पीपल मीटर) लगाए जाते हैं, जो यह रिकॉर्ड करते हैं कि कौन-सा चैनल कितनी देर तक देखा गया।
इन आंकड़ों का विश्लेषण आयु, लिंग, ग्रामीण-शहरी पृष्ठभूमि तथा सामाजिक-आर्थिक वर्गों के आधार पर वेटेज देकर किया जाता है और फिर पूरे देश के दर्शकों का अनुमान लगाया जाता है। इसी आधार पर साप्ताहिक टीआरपी रिपोर्ट जारी होती है।
जब भी कोई चैनल किसी घटना को “राई का पहाड़” बनाकर सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत करता है, तो तुरंत आरोप लगता है कि यह सब टीआरपी का खेल है। यह आरोप पूरी तरह निराधार नहीं है, लेकिन क्या सारा ठीकरा मीडिया पर फोड़ देना पर्याप्त है? वास्तव में इसमें जनता की भी सहभागिता छिपी हुई है। टीआरपी किसी चैनल के स्टूडियो में नहीं, बल्कि दर्शकों के ड्राइंग रूम में बनती है।
विडंबना यह है कि जिस कंटेंट को लोग चटकारे लेकर देखते हैं, उसी की सार्वजनिक रूप से आलोचना भी करते हैं। मीडिया को कोसना और स्वयं को “दूध का धुला” बताना वास्तविकता से आंख मूंदने जैसा है। यदि दर्शक किसी कार्यक्रम को देखना बंद कर दें, तो उसकी टीआरपी स्वतः गिर जाएगी। बाजार का सिद्धांत है—जो बिकता है, वही दिखाई देता है।
यदि सनसनी, विवाद, भावनात्मक उत्तेजना और तीखी बहसों वाले कार्यक्रम लगातार ऊंची टीआरपी प्राप्त करते हैं, तो इसका अर्थ है कि दर्शकों का बड़ा वर्ग उन्हें देख भी रहा है। ऐसे में मीडिया की आलोचना करते समय दर्शकों की भूमिका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति मिठाई खाकर मधुमेह के लिए केवल हलवाई को दोषी ठहरा दे।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि मीडिया अपनी जवाबदेही से मुक्त हो जाता है। पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि एक सामाजिक दायित्व भी है। उसका उद्देश्य केवल दर्शकों की पसंद का पीछा करना नहीं, बल्कि समाज को तथ्यपरक, संतुलित और विश्वसनीय सूचना उपलब्ध कराना भी है। यदि मीडिया दर्शकों की कमजोरियों को भुनाने लगे, तो उसका मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
टीआरपी की अंधी दौड़ में यदि समाचार और मनोरंजन की सीमाएं धुंधली हो जाएं, तथ्यों की जगह उत्तेजना ले ले और बहस की जगह शोर हावी हो जाए, तो पत्रकारिता की साख प्रभावित होना स्वाभाविक है। शायद यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में दर्शक पारंपरिक टीवी मीडिया से हटकर डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित हुए हैं। सूचना के स्रोत बढ़े हैं और दर्शकों के पास विकल्प भी।
टीआरपी के खेल में दोष और दायित्व दोनों साझा हैं। मीडिया वही परोसता है, जिसे देखने वाले मौजूद हैं, और दर्शक वही देखते हैं, जो उन्हें आकर्षित करता है। स्वस्थ पत्रकारिता और स्वस्थ जनमत दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। आखिरकार, कहावत भी है—“ताली एक हाथ से नहीं बजती।”















