संपादकीय
08 Jun, 2026

मौसम का चक्र नहीं, जल प्रबंधन की वार्षिक परीक्षा, 'हर बूंद' बचाने का है संकल्प

मानसून के दौरान बाढ़ और सूखे के विरोधाभास को समाप्त करने के लिए वैज्ञानिक जल बजट, शहरी जल निकासी तंत्र के ऑडिट और पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

भोपाल, 08 जून।

भारत में मानसून केवल वर्षा का मौसम नहीं, बल्कि कृषि, अर्थव्यवस्था, जल सुरक्षा और शहरी प्रबंधन की वार्षिक परीक्षा भी है। देश की लगभग 52 प्रतिशत खेती आज भी वर्षा पर निर्भर है और करीब 60 करोड़ लोगों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानसून से जुड़ी है। ऐसे में हर साल बारिश के साथ एक सवाल भी आता है—क्या हमने पानी को संभालने की तैयारी की या फिर एक बार फिर उसे बह जाने देंगे?

देश का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि एक ओर कुछ क्षेत्रों में बाढ़ आती है तो दूसरी ओर कुछ ही महीनों बाद पेयजल संकट खड़ा हो जाता है। नीति आयोग पहले ही चेतावनी दे चुका है कि भारत के अनेक बड़े शहर गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रहे हैं। इसका कारण केवल कम बारिश नहीं, बल्कि वर्षाजल के संरक्षण की विफल व्यवस्था है। भारत में हर वर्ष औसतन हजारों अरब घनमीटर वर्षाजल उपलब्ध होता है, लेकिन उसका बहुत बड़ा हिस्सा बिना उपयोग समुद्र में चला जाता है।

मध्य प्रदेश जैसे राज्य के लिए यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण है। नर्मदा, ताप्ती, बेतवा, चंबल और सोन जैसी नदियों वाला प्रदेश होने के बावजूद कई जिलों में गर्मियों में पेयजल संकट पैदा हो जाता है। इसका सीधा अर्थ है कि समस्या पानी की उपलब्धता नहीं, बल्कि उसके प्रबंधन की है। अब समय आ गया है कि हर जिले के लिए अलग जल बजट तैयार किया जाए, जिसमें वर्षा, भूजल दोहन और जल संरक्षण का वार्षिक वैज्ञानिक आकलन अनिवार्य हो।

शहरों की स्थिति भी चिंताजनक है। कंक्रीट के बढ़ते जंगलों ने जमीन की जल सोखने की क्षमता को कम कर दिया है। नालों पर अतिक्रमण और तालाबों के भराव क्षेत्र में निर्माण के कारण कुछ घंटों की बारिश ही जलभराव को आपदा में बदल देती है। नगर निकायों की जवाबदेही तय होनी चाहिए कि हर वर्ष मानसून पूर्व सभी जल निकासी तंत्र का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। यह औपचारिकता नहीं, कानूनी दायित्व बनना चाहिए।

कृषि क्षेत्र में भी बदलाव की आवश्यकता है। कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना, माइक्रो इरिगेशन को अनिवार्य प्रोत्साहन देना और प्रत्येक ग्राम पंचायत में खेत तालाबों तथा चेक डैम का भू-वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर निर्माण करना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता है। जल संरक्षण के कार्यों को केवल मनरेगा तक सीमित रखने के बजाय उन्हें दीर्घकालिक प्राकृतिक संपदा निर्माण कार्यक्रम से जोड़ा जाना चाहिए।

पर्यावरण के स्तर पर सबसे बड़ी जरूरत स्थानीय जलग्रहण क्षेत्रों और पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन की है। पिछले तीन दशकों में हजारों छोटे तालाब और प्राकृतिक नाले शहरी विस्तार की भेंट चढ़ गए। यदि प्रत्येक जिले में कम से कम 100 पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनर्जीवन का समयबद्ध अभियान चलाया जाए तो भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार संभव है। इसके साथ ही नदी किनारे हरित पट्टी विकसित करना और पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर स्थानीय प्रजातियों का पौधारोपण वर्षा जल के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

मानसून का स्वागत केवल पहली बारिश का आनंद लेकर नहीं, बल्कि हर बूंद को भविष्य की पूंजी मानकर करना होगा। जिस दिन भारत वर्षाजल को संग्रहित करने की संस्कृति विकसित कर लेगा, उसी दिन बाढ़ और सूखे का यह विरोधाभास काफी हद तक समाप्त हो जाएगा। प्रकृति हर वर्ष अपना दायित्व निभाती है, अब जिम्मेदारी हमारी है कि हम उसके उपहार को संसाधन में बदलें, समस्या में नहीं।

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