संपादकीय
08 Jun, 2026

कॉकरोच जनता पार्टी: युवाओं का आक्रोश या प्रायोजित 'एंटी-इंडिया' टूलकिट का नया चेहरा?

नीट विवाद की आड़ में शुरू हुए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के आंदोलन को विपक्ष की एक प्रायोजित टूलकिट बताते हुए इसके पीछे की राजनीतिक मंशा और देशहित पर इसके प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।

नई दिल्ली, 08 जून।

भारत में कॉकरोच अगेंस्ट इंडिया मूवमेंट शुरू हो रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी बनाने वाले अभिजीत दीपके अमेरिका से डिपोर्ट कर दिए गए हैं। दिल्ली पहुंचते ही उन्होंने आंदोलन की शुरुआत कर दी है। उनके प्रवक्ता बने जो भी चेहरे अभी सामने आए हैं, वे सभी आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं। अरविंद केजरीवाल के वालंटियर भी इनमें दिखाई पड़ रहे हैं। समस्याओं के समाधान के लिए आंदोलन लोकतंत्र की बुनियाद है, लेकिन आंदोलन के नाम पर प्रायोजित राजनीति उसका दुरुपयोग है।

कॉकरोच जनता पार्टी वर्चुअल वर्ल्ड से निकलकर मूवमेंट में उतर रही है। उसका पूरा टूलकिट आम आदमी पार्टी से मिलता-जुलता लगता है। समय के साथ यह साबित भी होगा। पंजाब में अगले साल चुनाव हैं। दिल्ली की सत्ता तो केजरीवाल के हाथ से फिसल चुकी है। पंजाब में चुनाव जीतने के लिए माहौल बनाने की शुरुआत हो गई है। उनकी सरकारों का जो प्रदर्शन रहा है, उसके बाद करप्शन अगेंस्ट इंडिया मूवमेंट चलाने की हिम्मत करना उनके बूते की बात नहीं है।

जिस आंदोलन से केजरीवाल को सत्ता मिली, राज्यों में सरकारें बनीं और जिस अन्ना हजारे का उन्हें सहारा मिला, वह सब अब पीछे छूट चुका है। भ्रष्टाचार के आरोप में स्वयं केजरीवाल को जेल जाना पड़ा। अब आंदोलन के टूलकिट से करप्शन अगेंस्ट इंडिया की आवाज नहीं आ रही है। उसने कॉकरोच जनता पार्टी का नया चेहरा बना लिया है। जिसने सोशल मीडिया पर यह पार्टी बनाई, उसने पहले दिन से ही कानून के विरुद्ध काम किया।

अभिजीत दीपके अमेरिका स्टूडेंट वीजा पर गए हुए थे। ऐसे वीजा पर किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं हुआ जा सकता। उनके इस अवैध कार्य के कारण अमेरिकी प्रशासन ने उन्हें डिपोर्ट कर दिया। जो स्वयं नियमों का उल्लंघन करने का आदी है, वह युवाओं को नियमों के पालन का आंदोलन करने की बात करता है। फिर भी उनकी नीयत पर हम अभी सवाल नहीं उठाते। वे अपने हर वीडियो में कह रहे हैं कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री से इस्तीफा लेना उनके आंदोलन का एजेंडा है। युवाओं की समस्याओं का समाधान उनका एजेंडा नहीं है। उनका एजेंडा राजनीतिक प्रतीत होता है।

नीट, सीबीएसई और दूसरी परीक्षाओं को लेकर जो भी सवाल हैं, उन पर सरकार न केवल संवेदनशील दिख रही है, बल्कि व्यवस्था में सुधार की दिशा में भी कदम उठा रही है। नीट की आगामी परीक्षा के लिए वायु सेवा तक का उपयोग करने की बात हो रही है।

अभिजीत दीपके यह नहीं बताते कि उनकी फंडिंग कहां से हो रही है। कुछ भी लंबे समय तक छिपा नहीं रहता, सब सामने आ ही जाता है। करप्शन अगेंस्ट इंडिया मूवमेंट का जिस तरह लाभ उठाकर राजनीतिक सत्ता हासिल की गई और उसके बाद भ्रष्टाचार के आरोप लगे, वैसा ही उद्देश्य कॉकरोच मूवमेंट का भी प्रतीत होता है। यह आंदोलन युवाओं के कल्याण के लिए नहीं, बल्कि एंटी इंडिया एजेंडे की ओर झुका हुआ लगता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी सरकार को मिले जनादेश से अधिक उसके विरोध में राय रखने वाले लोग होते हैं। यह लोकतंत्र की एक स्वाभाविक कमजोरी भी है। वर्तमान राजनीतिक स्थिति में मुकाबला बीजेपी बनाम अन्य दलों का बन गया है। बीजेपी का विरोध विचारधारा के स्तर पर है, नीतियों के स्तर पर नहीं। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि नीतियों को लेकर किसी भी विपक्षी दल ने कोई ठोस विकल्प प्रस्तुत नहीं किया है।

चुनावी राजनीति में लगभग सभी दल राज्य दर राज्य पराजित हो रहे हैं। इसलिए अब उन्हें बीजेपी सरकार को सत्ता से हटाने का कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई नहीं पड़ रहा है। बांग्लादेश और नेपाल में जेनरेशन-ज़ेड से जुड़े आंदोलनों के बाद हुए राजनीतिक बदलावों में उन्हें अपने लिए उम्मीद दिखाई देती है। लेकिन जो लोग इससे आशा लगाए बैठे हैं, वे शायद यह भूल रहे हैं कि उन दोनों देशों में सबसे ज्यादा हमला विपक्षी राजनीति के नेताओं पर ही हुआ था। बीजेपी की सरकार एक दशक से केंद्र में है। जिन दलों ने कई दशकों तक देश पर शासन किया, उनके खिलाफ जनाक्रोश का परिणाम ही बीजेपी का सत्ता में आना था। यदि उस आक्रोश को भड़काने की कोशिश की जाएगी तो उसका पहला खामियाजा उन्हीं नेताओं को भुगतना पड़ेगा, जो इसे हवा देने में लगे हैं।

अरविंद केजरीवाल ही नहीं, कॉकरोच जनता पार्टी से राहुल गांधी ने भी कई उम्मीदें पाल रखी हैं। उनका यह बयान कि देश में आर्थिक सुनामी आने वाली है, मोदी के खिलाफ संस्थागत विद्रोह हो रहा है और एक साल में मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे, उसी टूलकिट का हिस्सा प्रतीत होता है जिसमें यह कल्पना की जा रही है कि कॉकरोच जनता पार्टी युवाओं को एकजुट कर बड़ा आंदोलन खड़ा करेगी और फिर भारत में भी बांग्लादेश तथा नेपाल जैसे हालात बन जाएंगे। कॉकरोच जनता पार्टी की नीयत देशहित में नहीं दिखती। इसलिए इसका हश्र भी वैसा ही हो सकता है जैसा ‘चौकीदार चोर है’, हिंडनबर्ग रिपोर्ट और वोट चोरी जैसे अभियानों का हुआ। सोशल मीडिया और देश की जमीनी राजनीति के बीच अब भी बड़ा अंतर है।

ऐसा कहा जा रहा है कि सोनम वांगचुक का समर्थन भी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को मिल गया है। शाहीन बाग भी ऐसा ही एक आंदोलन था। सरकार ने पूरा धैर्य दिखाया और धीरे-धीरे जब तमाम तथ्य सामने आए तो वह आंदोलन अपने आप समाप्त हो गया।

युवाओं की समस्याओं का समाधान जरूरी है। पेपर लीक की घटनाओं पर रोक लगना भी बेहद आवश्यक है। देश पेपर लीक जैसी घटनाओं का दर्द एक बार झेल सकता है, लेकिन यदि उसके बहाने कोई एंटी इंडिया मूवमेंट खड़ा करने का प्रयास करता है तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। मुगल आक्रांता जो नहीं कर पाए और अंग्रेज भी अनेक प्रयासों के बावजूद भारत को नहीं डिगा पाए, वह काम इस तरह के आंदोलनों से भी संभव नहीं होगा।

बीजेपी से लड़ना है तो राजनीतिक रूप से लड़ना होगा। युवाओं के कंधों पर सोशल मीडिया के वर्चुअल संसार का उपयोग कर एंटी इंडिया मूवमेंट खड़ा करने का प्रयास कभी सफल नहीं हो पाएगा। देश का युवा सब समझता है।

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आज का राशिफल

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