भोपाल, 08 जून।
गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग बड़े-बड़े मौलाना उठा रहे हैं। हर राज्य से यह मांग उठ रही है। ऐसा लगता है कि गौमाता की रक्षा को मिल रहे देशव्यापी समर्थन को देखते हुए यह मांग सौहार्द्र की चाशनी में लिपटी हुई है। अगर गाय राष्ट्रीय पशु घोषित हो जाती है, तो क्या उसे काटने वाले सुधर जाएंगे?
क्या कोई कानून किसी को सुधार सकता है? गाय को माता कहा जाता है। गाय हमारी संस्कृति और आजीविका से जुड़ी हुई है। कृषि प्रधान देश में गोवंश के बिना पहले खेती की कल्पना नहीं की जा सकती थी। अब यंत्रीकरण हो गया है। देश में उसी की ज्यादा चर्चा होती है, जो राजनीति का विषय बन जाता है। जब देश में भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व राजनीति की नजरों से दूर थे, तब ऐसी मांग नहीं उठी। अब कई राज्यों में गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध है।
राज्यों के मुख्यमंत्री गौहत्या की घटनाओं पर कड़ा रुख अपनाते हैं। अक्सर देखा जाता है कि मुख्यमंत्री गायों की पूजा कर रहे हैं। दो दशक पहले ऐसा नजारा कम ही दिखता था। उमा भारती तो मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में हर दिन गाय की पूजा करती थीं। हर दिन तो नहीं, लेकिन सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अक्सर गाय की पूजा करते दिखाई पड़ते हैं। बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी गौपूजन की शुरुआत की है।
बंगाल ऐसा राज्य था, जहां बकरीद के अवसर पर गाय की कुर्बानी देने पर भी प्रतिबंध नहीं था। शुभेंदु सरकार ने पहली बार इस पर रोक लगाई।
पहली आवाज बंगाल में ही मुस्लिम समाज की ओर से आई कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए। फिर उत्तर प्रदेश और कई दूसरे राज्यों से भी ऐसी ही मांगें उठने लगीं। विभिन्न समुदायों के बीच उनकी आस्थाओं और धार्मिक प्रतीकों के प्रति सद्भावना का वातावरण निश्चित ही देशहित में है, लेकिन इस मांग के पीछे के मंतव्य को योगी आदित्यनाथ बखूबी समझते हैं।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग मौलाना उठा रहे हैं। हमारी संस्कृति में गाय को माता के रूप में माना जाता है। माता-पिता के मान, सम्मान और संरक्षण के लिए क्या किसी घोषणा की जरूरत है? अगर यह मान भी लिया जाए कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाता है, तो क्या उसे काटने वाले गौहत्या बंद कर देंगे?
अभी देश में राष्ट्रीय स्तर पर गौहत्या प्रतिबंध नहीं है। कई राज्यों में गौहत्या पर प्रतिबंध के कड़े कानून बनाए गए हैं। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में गौहत्या और बीफ की बिक्री पर सख्त प्रतिबंध है। उल्लंघन करने पर 10 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। दूसरी तरफ, पूर्वोत्तर के कई राज्यों में इस पर प्रतिबंध नहीं है। राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में पहले से ही देश में बाघ राष्ट्रीय पशु, मोर राष्ट्रीय पक्षी और हाथी राष्ट्रीय धरोहर पशु घोषित हैं। इनके भी शिकार की घटनाएं सामने आती हैं।
मनुष्य पशु को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग कर रहा है। पशु के पास यह अवसर नहीं है कि वह मनुष्य को राष्ट्रीय मनुष्य घोषित करने की मांग कर सके। मनुष्य खुद जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और मजहब में बंटा हुआ है। जितने भी विवाद हैं, उनमें पशु शामिल नहीं हैं। वे सब मनुष्यों के बीच ही हैं। अगर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने से गौहत्या रुक सकती है, तो फिर मनुष्य को राष्ट्रीय मनुष्य घोषित करने पर बहुत-सी समस्याओं का समाधान हो सकता है।
इस मांग के पीछे भी राजनीति है। कई राज्य ऐसे हैं, जहां गौहत्या पर प्रतिबंध नहीं है। ऐसे राज्यों में भी भाजपा की सरकार है। वहीं कई राज्यों में भाजपा सरकारों ने गौहत्या पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। जो लोग इसकी मांग कर रहे हैं, वे यह जानते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश के लिए इस विषय पर कोई एक समान विधान नहीं बनाया जा सकता। इसलिए अपने कुकृत्यों को इस मांग के पीछे छिपाने की कोशिश की जा रही है। मांग करने वालों के मन में अगर गाय के प्रति इतना सम्मान है और गाय पर आस्था रखने वालों के प्रति आदर है, तो बिना राष्ट्रीय पशु घोषित हुए भी उनका समाज गाय के प्रति यही भाव रख सकता है।
भारत धर्म के आधार पर पहले ही विभाजित हो चुका है। इस्लाम के जो अनुयायी भारत को अपना राष्ट्र नहीं मानते थे, उन्होंने अपने धर्म के लिए एक अलग राष्ट्र का निर्माण कराया। आज भी आजादी के समय का मजहबी चिंतन पूरी तरह समाप्त नहीं कहा जा सकता। आज भी संविधान से ज्यादा पर्सनल कानून को प्राथमिकता दी जाती है। आज भी राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीयता के लिए घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने पर राष्ट्रीय सहमति नहीं है।
आज भी भारत दुनिया का अकेला देश है, जिसकी नागरिकता का कोई रजिस्टर नहीं है। एनआरसी का विरोध किया जाता है। गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग यह इशारा करती है कि लोग सुधारना चाहते हैं, लेकिन उनके अनुसार इसके लिए कानून जरूरी है। राष्ट्रीय मनुष्य बनेगा तो उसे वंदे मातरम् राष्ट्रगीत गाने में कोई एतराज नहीं होगा।
संविधान पर पर्सनल कानून को प्राथमिकता देने की जिद नहीं होगी। देश के प्रत्येक नागरिक के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड पर सर्वानुमति होगी।
अगर हर नागरिक राष्ट्रीय मनुष्य हो जाएगा, तो देश में किसी भी माता-पिता को बुढ़ापे में संरक्षण के लिए सरकार को कानून नहीं बनाना पड़ेगा। भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम प्रभावशील है। यह कानून भारतीय संस्कृति और भारत की आत्मा को लहूलुहान कर रहा है।















