संपादकीय
08 Jun, 2026

ढाई-ढाई साल की ताजपोशी, किस संविधान के तहत?

कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद के सत्ता हस्तांतरण और ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले पर आधारित कांग्रेस की आंतरिक राजनीति राज्य की स्थिरता और भविष्य के लिए नई चुनौतियां पेश कर रही है।

बेंगलुरु, 08 जून।

संविधान जो नहीं कहता, वह कांग्रेस करती है। ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री पद का कोई प्रावधान संविधान में नहीं है, लेकिन राहुल गांधी का विधान ढाई-ढाई साल का है। कई राज्यों में तो यह विधान लागू नहीं हो पाया, लेकिन कर्नाटक में तीन साल बाद मुख्यमंत्री पद का ट्रांसफर हो गया है। डी.के. शिवकुमार मुख्यमंत्री बन गए हैं। उन्हें अब दो साल मुख्यमंत्री रहने का मौका मिलेगा।

ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बने सिद्धारमैया ने तीन साल बाद पद छोड़ा है। ऐसे ही नहीं छोड़ा, बल्कि हाईकमान से तमाम सौदे भी किए हैं। सरकार की कैबिनेट के मुखिया तो डी.के. शिवकुमार होंगे, लेकिन उसकी निष्ठा विभाजित रहेगी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर भी सिद्धारमैया खेमे का दावा बना रहेगा। उनका खेमा यही दबाव बना रहा है कि उनकी सरकार में डिप्टी मुख्यमंत्री के रूप में डी.के. शिवकुमार की जो स्थिति थी और जो विभाग उनके पास थे, वही स्थिति सिद्धारमैया के प्रतिनिधि को मिले। उनके बेटे को भी मंत्रिमंडल में जगह देने की सौदेबाजी की चर्चा है।

मुख्यमंत्री के पास काम करने के लिए केवल एक साल ही बचेगा। आखिरी साल तो चुनावी साल ही माना जाता है। कांग्रेस ने सत्ता भले हस्तांतरित कर दी हो, लेकिन पार्टी सरेंडर की मुद्रा में दिखाई पड़ रही है। डी.के. शिवकुमार वोक्कालिंगा समाज से आते हैं, जिसकी आबादी सीमित है। सिद्धारमैया अहिंदा की राजनीति करते हैं और ओबीसी वर्ग से आते हैं। कर्नाटक में वोक्कालिंगा, लिंगायत और अहिंदा तीन बड़े सामाजिक समूह हैं। डी.के. पार्टी के लिए ट्रबलशूटर हो सकते हैं। आर्थिक रूप से भी उन्हें कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। उन पर कई तरह की जांचें भी हो चुकी हैं। हालांकि उनका जनाधार पूरे कर्नाटक में समान रूप से फैला हुआ नहीं है।

कांग्रेस और राहुल गांधी कितनी भी कोशिश करें, लेकिन कर्नाटक का सियासी नाटक अगले चुनाव तक खत्म होता नहीं दिखता। इस नाटक का अंत चुनावी पराजय के साथ ही हो सकता है। वैसे भी कांग्रेस में पिछले 25 वर्षों से किसी भी राज्य में सरकारें लगातार दोबारा नहीं लौटी हैं। कांग्रेस की आखिरी रिपीट सरकार मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह की थी। जहां भी कांग्रेस एक बार जीत जाती है, वहां उसका शासन और आंतरिक सत्ता संघर्ष इतना कमजोर साबित होता है कि उसे दोबारा बहुमत नहीं मिलता। जिन राज्यों में आज कांग्रेस की सरकारें हैं, वहां भी ऐसे ही हालात दिखाई देते हैं।

अगर जातीय समीकरणों के हिसाब से देखा जाए तो कांग्रेस का राजनीतिक लाभ सिद्धारमैया के साथ खड़े रहने में ही था। राहुल गांधी केवल राजनीति में ही नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन, उद्योगपतियों और पत्रकारों के संदर्भ में भी जातीय प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते रहे हैं। उनका नारा है— जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। राहुल गांधी स्वयं कहते हैं कि कांग्रेस ने ओबीसी और दलितों के मामले में यदि अपनी केंद्र सरकारों के समय गलतियां नहीं की होतीं, तो ये समुदाय पार्टी से दूर नहीं जाते।

अतीत की गलतियों को स्वीकार करने के बावजूद राहुल गांधी ने एक ओबीसी मुख्यमंत्री को हटाकर सामान्य वर्ग के नेता को मुख्यमंत्री बनाया है। यह निर्णय भी भारी दबाव में लिया गया प्रतीत होता है। राहुल गांधी का राजनीतिक रिकॉर्ड कांग्रेस को मजबूत करने की बजाय कई बार कमजोर करने वाला माना जाता है। कांग्रेस में बगावत के लिए भी अक्सर उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाता है। पार्टी छोड़कर भाजपा में गए कई नेताओं ने न केवल संवैधानिक पद प्राप्त किए, बल्कि भाजपा के विस्तार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसका एक और कारण यह भी दिखाई देता है कि कांग्रेस में प्रियंका गांधी की भूमिका लगातार बढ़ रही है। उनके संयमित आचरण और प्रभावी भाषण शैली की प्रशंसा कांग्रेस ही नहीं, भाजपा के नेता भी करते हैं। केरल में मुख्यमंत्री के चयन को लेकर भी राहुल गांधी को अंततः वी.डी. सतीशन के नाम पर सहमत होना पड़ा। इसके पीछे ऊपर से मुस्लिम लीग के विधायकों का दबाव दिखाई देता है, लेकिन राजनीतिक रणनीति में प्रियंका गांधी की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। वह वायनाड से सांसद हैं।

कर्नाटक के लोगों को कांग्रेस सरकार से क्या मिला, इसका आकलन किया जाए तो साफ दिखता है कि स्पष्ट बहुमत के बावजूद राज्य राजनीतिक अस्थिरता का शिकार बना रहा है। राज्य के विकास को नई दिशा नहीं मिल सकी। कांग्रेस आलाकमान ने जब सिद्धारमैया को दिल्ली बुलाकर इस्तीफे का संकेत दिया, तब उन्होंने भी अपने राजनीतिक दांव चलने में कोई कमी नहीं छोड़ी। उन्होंने राज्यसभा का प्रस्ताव ठुकरा दिया और ओबीसी जातियों के सरकारी सर्वेक्षण के निष्कर्ष सार्वजनिक कर दिए। यह ऐसा पिटारा है, जिसके दुष्परिणाम कांग्रेस को लंबे समय तक भुगतने पड़ सकते हैं।

भाजपा जब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में नए नेतृत्व को अवसर देती है, तब कांग्रेस उन मुख्यमंत्रियों को ‘पर्ची सीएम’ कहकर तंज कसती है। कांग्रेस में तो अब ‘पट्टा सीएम’ की परंपरा चलती दिखाई दे रही है। डी.के. शिवकुमार भी उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं। ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री बनाने की परंपरा संविधान की भावना के अनुरूप नहीं कही जा सकती। जिन राज्यों में यह फार्मूला लागू नहीं हो पाया, वहां मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच संघर्ष ने सरकारों को संकट में डाल दिया। कर्नाटक में सत्ता हस्तांतरण का सियासी नाटक भले पूरा हो गया हो, लेकिन इसके परिणाम अलग होंगे, ऐसा मानने का कोई ठोस कारण फिलहाल दिखाई नहीं देता।

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