संपादकीय
08 Jun, 2026

गोवा के तटों से मिली सीख, अब कचरे से नहीं काहिली से है लड़ाई

गोवा के तटों पर सीमा नागर की टीम द्वारा चलाए जा रहे 'क्लीन कोस्ट, ग्रीन गोवा' अभियान के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को इवेंट नहीं बल्कि आदत बनाने का संदेश दिया गया है।

गोवा, 8 जून।

टीम का श्रम-साधना संदेश है कि यदि विदेशों जैसे साफ तट चाहिए तो 5 जून नहीं, 365 दिन का संकल्प चाहिए। अरब सागर की लहरें इन दिनों गोवा के तटों पर सिर्फ सीप-शंख नहीं, मानव की लापरवाही का कचरा-पुराण भी उगल रही हैं। कोलवा, बागा, मीरामार से लेकर पालोलेम तक प्लास्टिक की बोतलें, चिप्स के पैकेट, शराब की टूटी बोतलें और थर्माकोल की प्लेटें समंदर का सीना छलनी कर रही हैं। परंतु इसी काले परिदृश्य में आशा की एक किरण चमक रही है। सामाजिक कार्यकर्ता सीमा नागर और उनकी 120 स्वयंसेवकों की टीम ने ‘क्लीन कोस्ट, ग्रीन गोवा’ अभियान के तहत पिछले 8 महीनों में 18 समुद्री तटों से 94 टन कचरा निकाला है। यह अभियान विश्व पर्यावरण दिवस की रस्म-अदायगी नहीं, मानव अस्तित्व बचाने की जमीनी लड़ाई है।

विदेशी तट चमकते क्यों हैं? क्योंकि वहां नागरिक उन्हें चमकाते हैं। नॉर्वे के ओस्लो फ्योर्ड, जापान के ओकिनावा और ऑस्ट्रेलिया के बॉन्डी बीच पर पानी इतना साफ है कि तलहटी के पत्थर तक गिने जा सकते हैं। कारण यह है कि वहां सरकार अकेली नहीं, समाज भी साथ खड़ा है। संडे बीच क्लीनिंग वहां के नागरिकों का वीकेंड रिचुअल है। सिंगापुर में समुद्र तट पर कचरा फेंकने पर 2,000 डॉलर तक का जुर्माना है, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि वहां का बच्चा-बच्चा जानता है कि मेरा कचरा मेरी जिम्मेदारी है। नतीजतन पर्यटन बढ़ता है, समुद्री जीव बचते हैं और देश की जीडीपी में ब्लू इकोनॉमी का हिस्सा 7 प्रतिशत तक पहुंचता है।

इसके उलट भारत का सच अलग है। केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान के अनुसार भारत के 7,500 किलोमीटर लंबे समुद्र तट पर प्रतिवर्ष 15,343 टन प्लास्टिक कचरा पहुंचता है। चेन्नई का मरीना बीच, मुंबई का जुहू-वर्सोवा, ओडिशा का पुरी और गुजरात का मांडवी—हर जगह मानसून के बाद समंदर कचरा वापस कर देता है। हम देवता मानकर नारियल चढ़ाते हैं और उसी में पॉलिथीन लपेटकर विसर्जित कर देते हैं। श्रद्धा और प्रदूषण का यह घालमेल आखिर कब रुकेगा?

गोवा और मुंबई सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने पर्यावरण बचाओ अभियान चलाए हैं। वर्सोवा बीच क्लीनअप के अफरोज शाह ने 2015 से अब तक 21,000 टन कचरा हटाया है। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें ‘चैंपियन ऑफ द अर्थ’ सम्मान से नवाजा। उनके साथ 10 साल की बच्ची से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक जुड़े। नतीजा यह हुआ कि वर्सोवा तट पर 20 साल बाद ऑलिव रिडले कछुए लौटे। यह किसी सरकारी योजना का नहीं, जनभागीदारी का चमत्कार है।

गोवा में सीमा नागर की टीम ने तीन-स्तरीय मॉडल अपनाया है। पहला, श्रमदान—प्रत्येक रविवार दो घंटे तट सफाई। दूसरा, जन-जागरूकता—पर्यटक भी इस अभियान से जुड़ रहे हैं। ‘सेल्फी विद सी’ की जगह ‘सेल्फी विद सैक’ का चलन बढ़ रहा है। तटीय झोंपड़ियों, शैक मालिकों और मछुआरों को प्लास्टिक के विकल्प दिए गए हैं। पत्तल-दोने वापस आए हैं और स्टील स्ट्रॉ का उपयोग बढ़ा है। तीसरा, निगरानी—ड्रोन से मैपिंग, मासिक कचरा ऑडिट और पंचायत को रिपोर्ट। जिस शैक से कचरा मिला, उसका लाइसेंस सात दिन के लिए निलंबित करने की व्यवस्था बनाई गई है। आठ महीनों में कोलवा बीच पर माइक्रोप्लास्टिक में 40 प्रतिशत कमी और केकड़ों की संख्या में 22 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि स्थानीय बच्चों ने ‘बीच गार्जियन क्लब’ बनाया और अब वे स्वयं पर्यटकों को कचरा डस्टबिन में डालने की सलाह देते हैं।

समस्या की जड़ 5 जून का ‘सेल्फी सिंड्रोम’ है। तमिलनाडु से गुजरात और ओडिशा से महाराष्ट्र तक हर राज्य में विश्व पर्यावरण दिवस पर तट सफाई होती है। अधिकारी, नेता और अभिनेता आते हैं, दो घंटे झाड़ू लगाते हैं, कैमरे चमकते हैं और शाम होते-होते सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। कारण यह है कि हमने पर्यावरण को इवेंट मैनेजमेंट बना दिया है, बिहेवियर मैनेजमेंट नहीं।

समाधान केवल कानून नहीं, जन-आदतों में बदलाव है। सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लागू है, लेकिन पॉलिथीन अब भी खुलेआम इस्तेमाल हो रही है। पंचायतों और नगर निगमों को ‘जीरो वेस्ट बीच’ का लक्ष्य दिया जाना चाहिए। स्कूलों में ‘एक छात्र-एक तट’ जैसी योजनाएं पर्यावरण को संस्कार का हिस्सा बना सकती हैं। पर्यटन को भी जिम्मेदारी से जोड़ना होगा। यदि पर्यटक अपने पीछे कचरा छोड़ने के बजाय सफाई में भागीदार बनें तो तटों की तस्वीर बदल सकती है।

पर्यावरण बचाना अभियान नहीं, आचरण है। जिस दिन भारत का बच्चा समंदर को डस्टबिन नहीं, दोस्त समझने लगेगा, उसी दिन वास्तविक परिवर्तन की नींव पड़ेगी। तट साफ होंगे तो पर्यटन बढ़ेगा, मछलियां बढ़ेंगी, अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और मानवता सुरक्षित रहेगी। आखिर समंदर बीमार होगा तो किनारे पर बसा इंसान स्वस्थ कैसे रहेगा? लड़ाई कचरे से कम और काहिली से ज्यादा है, और यह लड़ाई हम सबको मिलकर लड़नी होगी।

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