भोपाल, 08 जून।
दुनिया में हर साल लगभग 13 करोड़ महिलाएं मां बनती हैं, जबकि भारत में यह संख्या 2.7 करोड़ के करीब है। यह विशाल वर्ग अब वेलनेस इंडस्ट्री के लिए नया बाजार बन चुका है। प्रसव के बाद शारीरिक और मानसिक बदलावों से गुजर रही महिलाओं को महंगे विटामिन, स्पा, डिटॉक्स पैकेज और मातृत्व आरामगाह के नाम पर लाखों रुपये के पैकेज बेचे जा रहे हैं। न्यूयॉर्क, मालदीव और पेरिस जैसे शहरों में इनकी मांग तेजी से बढ़ी है। सवाल यह है कि यह वास्तविक देखभाल है या भावनात्मक शोषण।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि प्रसव के बाद हर महिला की रिकवरी अलग होती है, लेकिन वेलनेस उद्योग एक जैसी जरूरत का भ्रम पैदा कर रहा है। विज्ञापनों के जरिए यह संदेश दिया जाता है कि यदि विशेष क्रीम या सप्लीमेंट नहीं लिए गए तो मां या शिशु का स्वास्थ्य प्रभावित होगा। इस डर के सहारे मातृत्व को एक महंगे उत्पाद में बदला जा रहा है।
एशिया और दक्षिण अमेरिका में पारंपरिक घरेलू देखभाल, मालिश और परिवार का सहयोग वर्षों से नई मांओं की सबसे बड़ी ताकत रहा है। इसके विपरीत पश्चिमी देशों में सामुदायिक सहयोग की जगह महंगी सेवाओं ने ले ली है और यही मॉडल अब भारत के महानगरों तक पहुंच रहा है। जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रसव के बाद महिलाओं को सबसे अधिक जरूरत सामाजिक सहयोग, पर्याप्त विश्राम और मानसिक संबल की होती है।
सरकार को मातृत्व लाभ, आशा कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण और प्रसवोत्तर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक निवेश करना चाहिए। परिवारों को भी समझना होगा कि महंगा पैकेज प्रेम का प्रमाण नहीं होता। नई मांओं को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि थकी हुई और संघर्ष करती मां भी उतनी ही सक्षम और आदर्श होती है। मातृत्व उत्सव है, उपभोक्ता बाजार का उत्पाद नहीं। यदि समय रहते इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया गया तो मातृत्व का सबसे पवित्र अनुभव भी बाजारवाद की चकाचौंध में खो जाएगा।













