भोपाल, 08 जून।
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सत्ता संभालते ही भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति दोहराई थी, लेकिन विडंबना यह है कि जिस लोकायुक्त संगठन को भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का जिम्मा सौंपा गया है, उसी के अधिकारियों पर रिश्वत लेने के आरोप लग रहे हैं। हाल ही में भोपाल लोकायुक्त कार्यालय के एक निरीक्षक और आरक्षक को 80 हजार रुपये रिश्वत लेते पकड़ा गया। आरोप है कि शिकायत बंद करने के नाम पर पांच लाख रुपये की मांग की गई थी।
यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले दो वर्षों में लोकायुक्त संगठन के कई अधिकारियों और कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हो चुके हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाली संस्था ही संदेह के घेरे में हो, तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करे।
लोकायुक्त की जिला इकाइयों में भी लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। ट्रैप कार्रवाई की सूचना लीक होना, जांच में देरी और कमजोर चालान जैसी बातें संस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। सरकार की नीयत पर सवाल नहीं है, लेकिन नीति तभी प्रभावी होती है जब उसे लागू करने वाली व्यवस्था पारदर्शी और जवाबदेह हो।
जरूरत इस बात की है कि लोकायुक्त संगठन स्वयं के भीतर भी सख्त निगरानी व्यवस्था विकसित करे। आंतरिक सतर्कता तंत्र को मजबूत बनाया जाए, शिकायतों की डिजिटल ट्रैकिंग हो और दोषी अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सबसे पहले प्रहरी की साख बचाना आवश्यक है।
जनता भाषण नहीं, परिणाम देखती है। जब बाड़ ही ईमानदार होगी, तभी खेत सुरक्षित रहेगा। लोकायुक्त की विश्वसनीयता बचेगी, तभी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति भी जनता के बीच प्रभावी दिखाई देगी।














