नई दिल्ली, 01 जुलाई।
ऑल इंडिया बार एसोसिएशन (एआईबीए) ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर 23 विपक्षी दलों और एक निर्दलीय सांसद द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को दिए गए संयुक्त ज्ञापन पर आपत्ति जताई है। एसोसिएशन ने इसे संवैधानिक दृष्टि से अनुचित और संस्थागत मर्यादा के विपरीत बताते हुए कहा कि यदि किसी पक्ष को निर्वाचन आयोग की कार्रवाई पर आपत्ति है तो उसे सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
एआईबीए के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. आदीश सी. अग्रवाल ने मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र में कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश, निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक प्रमुख नहीं हैं। इसलिए आयोग के खिलाफ शिकायत का उचित माध्यम राजनीतिक ज्ञापन नहीं, बल्कि विधिसम्मत न्यायिक प्रक्रिया है।
उन्होंने कहा कि न्यायालय किसी मामले का निर्णय राजनीतिक ज्ञापनों के आधार पर नहीं, बल्कि याचिकाओं, साक्ष्यों, कानून और दोनों पक्षों की सुनवाई के आधार पर करते हैं। ऐसे में सीजेआई को संबोधित ज्ञापन न्यायिक कार्यवाही का विकल्प नहीं हो सकता।
डॉ. अग्रवाल ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। यदि किसी राजनीतिक दल को आयोग की किसी कार्रवाई में अवैधता, मनमानी या संवैधानिक त्रुटि दिखाई देती है, तो उसे सक्षम न्यायालय में उचित याचिका दाखिल करनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी दलों के पास कानूनी संसाधनों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की कोई कमी नहीं है। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया अपनाने के बजाय राजनीतिक ज्ञापन देना उनके आरोपों की कानूनी मजबूती पर प्रश्न खड़े करता है।
एआईबीए अध्यक्ष ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को राजनीतिक विवादों में शामिल करने का प्रयास संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने आगाह किया कि न्यायिक प्रक्रिया से बाहर ऐसे ज्ञापनों पर विचार करना भविष्य में गलत परंपरा स्थापित कर सकता है और राजनीतिक दलों को स्थापित कानूनी उपायों की अनदेखी करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।




















