नई दिल्ली, 1 जुलाई।
मरीजों की जान बचाने वाले हाथ जब खुद कांपने लगें, तो समाज को सोचना पड़ेगा कि धरती के भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर आखिर क्यों डिप्रेशन में हैं। हाल ही में फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (फाइमा) के आरएमएस 2.0 सर्वे ने जो तस्वीर सामने रखी है, वह डराने वाली है। देश के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 1,260 से अधिक रेजिडेंट डॉक्टरों पर हुए इस सर्वे में पता चला है कि कई डॉक्टर लगातार 36 घंटे से ज्यादा ड्यूटी कर रहे हैं और हर पांच में से एक डॉक्टर सप्ताह में 100 घंटे से ज्यादा काम कर रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि हर छठे डॉक्टर के मन में लगातार ड्यूटी से पैदा हो रहे तनाव के बीच आत्महत्या का ख्याल आता है।
यह आंकड़ा केवल डॉक्टरों की समस्या नहीं है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा से भी जुड़ा गंभीर मुद्दा है। लगातार थकान, नींद की कमी और मानसिक तनाव से चिकित्सा संबंधी त्रुटियों का जोखिम बढ़ सकता है। जब डॉक्टर खुद शारीरिक और मानसिक दबाव में जीवन जी रहे हों, तो मरीज के इलाज पर इसका सीधा असर पड़ना तय है। एक थका हुआ और तनावग्रस्त डॉक्टर दवा की सही खुराक तय करने में, ऑपरेशन के दौरान एकाग्र रहने में या मरीज से सहानुभूतिपूर्वक बात करने में चूक सकता है और इस चूक की कीमत किसी की जान हो सकती है।
डॉक्टरों के डिप्रेशन में जाने की वजह भी साफ है। पहला कारण है अमानवीय ड्यूटी घंटे। मेडिकल कॉलेजों और सरकारी अस्पतालों में रेजिडेंट डॉक्टरों से 24 घंटे, 36 घंटे और कभी-कभी 48 घंटे तक लगातार काम लिया जाता है। ड्यूटी के बाद अनिवार्य पोस्ट-ड्यूटी रेस्ट का कोई प्रावधान नहीं है। युवा डॉक्टर पढ़ाई के साथ-साथ इमरजेंसी वार्ड और ओपीडी का बोझ उठाते हैं, पर उनके आराम के बारे में कोई नहीं सोचता। दूसरा कारण है मरीजों और उनके परिजनों का बढ़ता आक्रोश। इलाज में देरी होने पर या मरीज की मृत्यु होने पर डॉक्टरों पर हमले की घटनाएं आम हो गई हैं। गालियां, धक्का-मुक्की और कई बार जानलेवा हमले डॉक्टरों को मानसिक रूप से तोड़ देते हैं। तीसरा कारण है संसाधनों की कमी और प्रशासनिक दबाव। एक डॉक्टर पर सैकड़ों मरीजों का भार है। जांच की सुविधा नहीं है, दवाएं नहीं हैं, बेड नहीं हैं, पर जवाब डॉक्टर को देना पड़ता है। वरिष्ठों का दबाव, विभाग का दबाव और सिस्टम की खामियों का ठीकरा भी जूनियर डॉक्टर के सिर फूटता है। चौथा कारण है भविष्य की अनिश्चितता। बॉन्ड नीति, कम स्टाइपेंड और स्थायी नौकरी की गारंटी का अभाव युवा डॉक्टरों को निराश करता है। एमबीबीएस के बाद पीजी की तैयारी और फिर तीन वर्ष तक कड़ी रेजिडेंसी के बाद भी सम्मानजनक वेतन और सुरक्षित माहौल न मिले, तो कोई भी टूट जाएगा।
डॉक्टरों को डिप्रेशन से बाहर लाने के लिए समाज, सरकार और सामाजिक संगठनों को आगे आना चाहिए। जवाब है—हां, और तुरंत आना चाहिए, क्योंकि यह केवल डॉक्टरों को बचाने का मामला नहीं है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र को बचाने का प्रश्न है। फाइमा ने केंद्र और राज्य सरकारों से रेजिडेंट डॉक्टरों के ड्यूटी घंटों का राष्ट्रीय स्तर पर नियमन करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि लंबी ड्यूटी के बाद अनिवार्य पोस्ट-ड्यूटी रेस्ट दिया जाए, डॉक्टरों की नई भर्ती कर काम का दबाव कम किया जाए, सभी मेडिकल कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता केंद्र बनाए जाएं, पारदर्शी शिकायत निवारण प्रणाली हो, बॉन्ड नीति में सुधार किया जाए और सभी राज्यों में समान स्टाइपेंड दिया जाए।
डॉक्टर भी इंसान हैं, मशीन नहीं। विकसित देशों में रेजिडेंट डॉक्टरों के काम के घंटे तय हैं। अमेरिका में सप्ताह में 80 घंटे और यूरोप में 48 घंटे की सीमा है। लगातार 24 घंटे से ज्यादा ड्यूटी नहीं ली जा सकती। भारत में भी राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को सख्त दिशा-निर्देश बनाकर लागू करने होंगे। अस्पतालों में ड्यूटी रोस्टर ऐसा हो कि हर डॉक्टर को सप्ताह में कम से कम एक दिन का अवकाश और हर ड्यूटी के बाद 12 घंटे का विश्राम मिले। रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए हॉस्टल में रहने, खाने और मानसिक परामर्श की सुविधा निःशुल्क होनी चाहिए।
समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह डॉक्टर को भगवान मानने के साथ-साथ इंसान भी समझे। मरीज की मौत पर डॉक्टर को पीटना बंद करना होगा, अस्पताल में तोड़फोड़ करना बंद करना होगा। याद रखिए कि डॉक्टर जान बचाने की कोशिश करता है, जान लेने की नहीं। यदि इलाज में कोई चूक लगती है, तो कानूनी रास्ता है, पर हिंसा समाधान नहीं है। मरीजों के परिजनों को धैर्य रखना होगा और डॉक्टरों से सम्मानपूर्वक बात करनी होगी। जब समाज डॉक्टर को सुरक्षा और सम्मान देगा, तो डॉक्टर भी बिना डर के बेहतर इलाज कर पाएगा।
सामाजिक संगठनों और गैर-सरकारी संस्थाओं को आगे आकर मेडिकल कॉलेजों में तनाव प्रबंधन कार्यशालाएं आयोजित करनी चाहिए। हेल्पलाइन शुरू करनी चाहिए, जहां डिप्रेशन से जूझ रहा डॉक्टर बिना झिझक बात कर सके। वरिष्ठ डॉक्टरों को मेंटर की भूमिका निभानी चाहिए, ताकि जूनियर डॉक्टर अकेला महसूस न करे। मेडिकल छात्रों के पाठ्यक्रम में योग, ध्यान और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषय जोड़े जाने चाहिए, ताकि वे शुरुआत से ही तनाव से निपटना सीखें। डॉक्टरों की सफलता की कहानियां भी सामने लानी होंगी। केवल लापरवाही की खबरें दिखाकर पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। जब कोरोना काल में डॉक्टरों ने अपनी जान पर खेलकर मरीजों को बचाया था, तब पूरे देश ने ताली बजाई थी। वही सम्मान उन्हें आज भी मिलना चाहिए।
हमें यह मान लेना चाहिए कि स्वस्थ डॉक्टर ही स्वस्थ समाज दे सकता है। यदि आज हमने डॉक्टरों के डिप्रेशन को नजरअंदाज किया, तो कल अस्पतालों में इलाज करने वाला कोई नहीं बचेगा। नई पीढ़ी मेडिकल क्षेत्र में आने से डरेगी और गांवों तक डॉक्टर पहुंच ही नहीं पाएंगे। इसलिए सरकार तुरंत ड्यूटी घंटे तय करे, नई भर्ती करे और सुरक्षा कानून सख्ती से लागू करे। समाज डॉक्टरों को हिंसा से बचाए और सम्मान दे। सामाजिक संगठन डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए सक्रिय होकर काम करें।
धरती के भगवान को बचाना है, तो उन्हें इंसान समझना होगा। उनकी थकान, उनकी नींद, उनकी छुट्टी और उनकी मुस्कान वापस लानी होगी। क्योंकि एक हंसता हुआ डॉक्टर ही मरीज के चेहरे पर मुस्कान ला सकता है और जब डॉक्टर खुश होगा, तभी मरीज भी सुरक्षित होगा। यह जिम्मेदारी हम सबकी है और शुरुआत आज ही करनी होगी, वरना बहुत देर हो जाएगी।




















