भोपाल, 1 जुलाई।
मध्यप्रदेश में बीमा अब संकट का कवच नहीं, बल्कि सवालों का पिटारा बनता जा रहा है। उपभोक्ता फोरम के ताजा आंकड़े इस हकीकत पर मुहर लगाते हैं। पूरे प्रदेश में दर्ज शिकायतों में 32 प्रतिशत मामले अकेले बीमा कंपनियों के खिलाफ हैं। ग्वालियर, इंदौर, भोपाल, जबलपुर सहित कई जिलों में बीमाधारक क्लेम रिजेक्शन, भुगतान में देरी और कैशलेस सुविधा से इनकार जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
उपभोक्ता फोरम में बीमा क्षेत्र शिकायतों में पहले स्थान पर है। दूसरे स्थान पर बिजली विभाग और तीसरे पर वित्त एवं निवेश क्षेत्र है। सहारा इंडिया जैसे मामलों में मैच्योरिटी के बाद भी भुगतान न मिलने की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं। यह स्थिति बताती है कि पॉलिसी बेचते समय किए गए वादे क्लेम के समय अक्सर दम तोड़ देते हैं।
जांच में सामने आया है कि कंपनियां छोटे क्लेम आसानी से मंजूर कर देती हैं, लेकिन बड़ी राशि के मामलों में पुरानी बीमारी, अधूरे दस्तावेज या नियमों का हवाला देकर भुगतान रोक दिया जाता है। कई बार भर्ती के समय कैशलेस सुविधा का आश्वासन दिया जाता है, लेकिन डिस्चार्ज के वक्त मरीज को पूरा बिल अपनी जेब से चुकाना पड़ता है और फिर उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।
ग्वालियर, भोपाल, इंदौर और जबलपुर के अनेक मामलों में उपभोक्ता फोरम ने बीमा कंपनियों को भुगतान के आदेश दिए। लगभग हर मामले में एक जैसी प्रवृत्ति दिखी—पॉलिसी बेचते समय सहमति और क्लेम के समय असहमति। इसका सबसे अधिक असर मध्यम वर्ग, किसानों, छोटे व्यापारियों और नौकरीपेशा लोगों पर पड़ रहा है।
समस्या की जड़ एजेंटों द्वारा अधूरी जानकारी देना, अस्पतालों और थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर के बीच समन्वय की कमी तथा क्लेम निपटाने में अनावश्यक देरी है। हर क्लेम अस्वीकार करने पर सात दिन के भीतर कारण सहित आदेश देना अनिवार्य होना चाहिए। प्रत्येक जिले में बीमा मामलों के लिए फास्ट ट्रैक व्यवस्था बने और निर्धारित समय-सीमा में फैसले हों। राज्य सरकार और नियामक को शिकायतों की नियमित निगरानी कर पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी। बीमा तभी सार्थक है, जब जरूरत के समय वह भरोसे के साथ खड़ा दिखाई दे।



















