नई दिल्ली, 1 जुलाई।
आज एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित समाचार—"नदी में दूध प्रवाहित करना भी प्रदूषण है"—ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसमें कोई विवाद नहीं है कि यदि बड़ी मात्रा में दूध किसी नदी में प्रवाहित किया जाए तो उससे जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। दूध एक जैविक पदार्थ है, जो पानी में घुलकर घुलित ऑक्सीजन की मात्रा कम करता है और जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इसलिए पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता को नकारा नहीं जा सकता।
लेकिन क्या यहीं से बहस समाप्त हो जानी चाहिए?
वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत की पर्यावरणीय चेतना केवल ऐसे प्रतीकात्मक प्रसंगों तक सीमित रह गई है, जबकि हमारी नदियां प्रतिदिन कहीं अधिक गंभीर और व्यापक प्रदूषण का सामना कर रही हैं। यदि ऐसा है, तो हमें पर्यावरण विज्ञान के साथ-साथ पर्यावरणीय प्राथमिकताओं पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
भारत की अधिकांश नदियां आज किसी एक धार्मिक अनुष्ठान से नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही प्रशासनिक विफलताओं के कारण संकट में हैं। देश के अधिकांश शहरों में सीवेज प्रबंधन की स्थिति दयनीय है। करोड़ों लीटर अनुपचारित सीवेज प्रतिदिन नालों के माध्यम से नदियों, तालाबों और झीलों में पहुंच रहा है। नगर निकायों के पास या तो पर्याप्त सीवेज शोधन संयंत्र नहीं हैं अथवा जो संयंत्र स्थापित हैं, वे पूरी क्षमता से कार्य नहीं कर रहे। परिणामस्वरूप हमारी नदियां धीरे-धीरे प्राकृतिक जलधाराओं से अधिक गंदे नालों में बदलती जा रही हैं।
यदि कोई सामान्य नागरिक किसी भी भारतीय शहर का निरीक्षण करे तो उसे खुले नालों में बहता घरेलू अपशिष्ट, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलता रासायनिक पानी, प्लास्टिक कचरा और औद्योगिक अवशेष दिखाई देंगे। अनेक कार सर्विस स्टेशन बिना समुचित अपशिष्ट उपचार व्यवस्था के तेल, ग्रीस और डिटर्जेंट युक्त पानी सीधे नालियों में छोड़ते हैं। यह सब उस समय हो रहा है, जब जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 जैसे कठोर कानून पहले से मौजूद हैं। प्रश्न कानूनों की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि उनके निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन का है।
यदि पर्यावरण संरक्षण वास्तव में हमारी प्राथमिकता है, तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की सक्रियता उन मामलों में अधिक क्यों दिखाई देती है, जो प्रतीकात्मक महत्व रखते हैं, जबकि प्रतिदिन होने वाले व्यापक प्रदूषण पर अपेक्षित कठोरता नहीं दिखती? राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को निरीक्षण, नमूने लेने, उद्योग बंद कराने और अभियोजन चलाने तक की कानूनी शक्तियां प्राप्त हैं। फिर भी अनुपचारित सीवेज नदियों में बह रहा है, छोटे उद्योग पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी कर रहे हैं और अनेक व्यावसायिक प्रतिष्ठान बिना प्रभावी निगरानी के संचालित हो रहे हैं।
धार्मिक आस्थाओं से जुड़े पर्यावरणीय प्रश्नों पर भी संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। प्रत्येक धर्म की कुछ परंपराएं ऐसी हैं, जिनका पर्यावरण पर प्रभाव पड़ सकता है। मंदिरों में चढ़ावा, प्रतिमा विसर्जन, बड़े धार्मिक आयोजन अथवा अन्य गतिविधियां यदि पर्यावरण को प्रभावित करती हैं, तो उनका वैज्ञानिक परीक्षण होना चाहिए। उसी प्रकार यदि किसी अन्य धार्मिक समुदाय के पर्वों के दौरान पशुओं के वध से उत्पन्न जैविक अपशिष्ट सार्वजनिक नालियों या जलस्रोतों तक पहुंचते हैं, तो उनका मूल्यांकन भी उसी वैज्ञानिक कसौटी पर होना चाहिए। पर्यावरण विज्ञान न किसी धर्म का पक्षधर होता है और न विरोधी। प्रदूषण की पहचान उसके प्रभाव से होती है, न कि प्रदूषक के धर्म से।
यदि नदी में दूध प्रवाहित करना पर्यावरणीय दृष्टि से अनुचित माना जाता है, तो वही मानदंड उन सभी गतिविधियों पर भी लागू होने चाहिए, जो किसी भी रूप में जलस्रोतों को प्रदूषित करती हैं। कानून का व्यवहार समान होना चाहिए। यदि उसमें चयन दिखाई देता है, तो जनता का विश्वास पर्यावरणीय संस्थाओं और पर्यावरणीय विमर्श, दोनों से कम होने लगता है।
मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि किसी धार्मिक आयोजन में नदी में दूध प्रवाहित होने की घटना प्रमुख खबर बनती है, तो उसी गंभीरता के साथ प्रतिदिन नदियों में बहने वाले अनुपचारित सीवेज, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की निष्क्रियता, अवैध औद्योगिक अपशिष्ट, कार सर्विस स्टेशनों से होने वाले प्रदूषण और नगर निकायों की विफलताओं पर भी व्यापक खोजी रिपोर्टें प्रकाशित होनी चाहिए। अन्यथा पर्यावरणीय विमर्श संतुलन खो देता है।
चार दशक से अधिक समय तक पर्यावरण और वन्यजीवन पर रिपोर्टिंग करते हुए मैंने मध्य भारत की अनेक नदियों को निकट से देखा है। नदियों का संकट किसी एक घटना या समुदाय से उत्पन्न नहीं हुआ। यह वर्षों की उपेक्षा, अनियोजित शहरीकरण, अवैध खनन, कमजोर प्रशासन और पर्यावरणीय कानूनों के असमान अनुपालन का परिणाम है। नदियां एक दिन में नहीं मरतीं, वे प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा दम तोड़ती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रतीकात्मक बहसों से आगे बढ़ें और उन वास्तविक कारणों पर ध्यान दें, जो हमारी नदियों को लगातार प्रदूषित कर रहे हैं। सरकारों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और नगर निकायों को यह बताना चाहिए कि प्रतिदिन कितना अनुपचारित सीवेज नदियों में जा रहा है, कितने उद्योगों पर कार्रवाई हुई, कितने अभियोजन चलाए गए और कितने नगर निकाय पर्यावरणीय मानकों का पालन करने में विफल रहे। यही वास्तविक पर्यावरणीय जवाबदेही होगी।
दूध नदी में डालना यदि प्रदूषण है, तो अनुपचारित सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, पशु वध से उत्पन्न जैविक अवशेष, प्लास्टिक, रसायन और डिटर्जेंट भी प्रदूषण हैं। नदी इनमें कोई भेद नहीं करती। इसलिए कानून और पर्यावरणीय चेतना को भी कोई भेद नहीं करना चाहिए।
यदि हमें सचमुच अपनी नदियों को बचाना है, तो चयनात्मक पर्यावरणवाद से ऊपर उठना होगा। पर्यावरण संरक्षण का आधार विज्ञान, समान कानून और निष्पक्ष प्रशासन होना चाहिए। तभी हमारी नदियां बचेंगी और पर्यावरणीय न्याय अपने वास्तविक अर्थों में स्थापित हो सकेगा। भारत को पर्यावरणीय आस्था नहीं, बल्कि पर्यावरणीय ईमानदारी की आवश्यकता है। नदियां किसी धर्म की नहीं, पूरे समाज की साझा धरोहर हैं। इसलिए प्रदूषण का मूल्यांकन भी धर्म नहीं, विज्ञान और कानून के आधार पर होना चाहिए।
-ललित शास्त्री




















