नई दिल्ली, 1 जुलाई।
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ, न्यायमूर्ति संजय करोल एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी बनाम डॉली सतीश गांधी एवं अन्य याचिका में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा दिया गया मुआवजा और मेडिक्लेम पॉलिसी से मिला भुगतान दो अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाले लाभ हैं। इसलिए मेडिक्लेम से मिली राशि को दुर्घटना मुआवजे में से नहीं काटा जा सकता।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाला मुआवजा एक वैधानिक अधिकार है, जबकि मेडिक्लेम पॉलिसी का लाभ प्रीमियम देकर खरीदा गया संविदात्मक अधिकार है। पीठ ने माना कि दोनों को "दोहरा लाभ" नहीं कहा जा सकता। हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि एक ही नुकसान के लिए दो बार मुआवजा नहीं लिया जा सकता, क्योंकि मुआवजा "न्यायसंगत" होना चाहिए, न कि "अप्रत्याशित लाभ"। पीठ ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी की अपील खारिज करते हुए बॉम्बे उच्च न्यायालय का निर्णय बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि पीड़ित को अपनी मेडिक्लेम पॉलिसी से मिली राशि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा दिए गए मुआवजे से नहीं काटी जाएगी।
मेडिक्लेम और मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के मुआवजे में बुनियादी अंतर क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों के सिद्धांतों का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि मेडिक्लेम पॉलिसी व्यक्ति स्वेच्छा से बढ़ते चिकित्सा खर्चों से बचने के लिए खरीदता है और इसमें बीमाकर्ता की देनदारी बीमित राशि तक सीमित होती है। यदि खर्च पॉलिसी की सीमा से अधिक हो जाए तो शेष राशि पीड़ित को स्वयं वहन करनी पड़ती है। इसके विपरीत, मोटर वाहन अधिनियम के तहत दिया जाने वाला मुआवजा "न्यायसंगत एवं उचित मुआवजे" के सिद्धांत पर आधारित होता है और इसकी कोई निश्चित मौद्रिक सीमा नहीं होती। इसका उद्देश्य पीड़ित अथवा मृतक के परिजनों को, जहाँ तक संभव हो, उसी आर्थिक स्थिति में लाना है, मानो दुर्घटना हुई ही न हो।
न्यायालय ने उदाहरण देते हुए कहा कि प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी और पेंशन जैसे रोजगार-संबंधी लाभ भी मुआवजे से नहीं काटे जा सकते, क्योंकि वे संविदा से प्राप्त स्वतंत्र अधिकार हैं। वहीं, यदि राज्य से मृत्यु पर अनुग्रह राशि या वैधानिक मुआवजा प्राप्त हुआ है, तो उसे मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा दिए जाने वाले मुआवजे से समायोजित किया जा सकता है, क्योंकि दोनों एक ही प्रकार की क्षति की भरपाई करते हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि "इस सवाल का जवाब शरलॉकियन डिडक्शन का मामला नहीं है" और उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा। यह निर्णय बीमा कंपनियों और दुर्घटना पीड़ितों के बीच लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद पर महत्वपूर्ण स्पष्टता प्रदान करता है।



















