नई दिल्ली, 08 जुलाई।
दिल्ली उच्च न्यायालय की एकल पीठ, न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने रवि कुमार बनाम गीता देवी एवं अन्य की याचिका में पितृत्व विवाद के मामले में डीएनए परीक्षण के आदेश को बरकरार रखा है।पीठ का मानना है कि बच्चे को यह जानने का अधिकार है कि उसके जैविक पिता कौन हैं। इसे "सत्य जानने का अधिकार" तथा "बच्चे के हित सर्वोपरि" के सिद्धांत से जोड़ा गया है। न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि जब किसी मामले में बच्चे की जैविक पहचान और पितृत्व का प्रश्न सीधे तौर पर विवाद का विषय हो, तब कथित पिता की सामाजिक प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत असहजता के आधार पर डीएनए परीक्षण से इनकार नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि न्याय का उद्देश्य बच्चे के उन अधिकारों की रक्षा करना है, जिनके तहत वह अपने जैविक पिता की पहचान जानना चाहता है और उससे जुड़े कानूनी अधिकारों का दावा करता है।
याचिका में भरण-पोषण के अधिकार के निर्धारण के लिए जैविक पिता की पहचान का विवाद था। याचिकाकर्ता की पहली पत्नी से तीन बच्चे थे। बाद में उसने दूसरा विवाह कर लिया और पहली पत्नी के बच्चों का जैविक पिता होने से इनकार कर दिया। जबकि बच्चों के साथ जन्मदिन समारोह के फोटो, स्कूल के फोटो, पूरे परिवार के चित्र तथा पहचान संबंधी दस्तावेज उपलब्ध थे। ऐसी स्थिति में परिवार न्यायालय ने डीएनए परीक्षण की अनुमति दी थी, जिसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।
न्यायिक निर्णय क्या कहते हैं:-
बच्चे का अधिकार बनाम निजता : सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने कहा है कि डीएनए परीक्षण एक संवेदनशील प्रक्रिया है। बच्चे का हित सर्वोपरि है, लेकिन निजता के अधिकार का भी सम्मान आवश्यक है। इसलिए दोनों के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने भी कहा है कि "निजता का अधिकार बच्चे के अधिकार और उसके हितों पर हावी नहीं हो सकता।"
कब आदेश होता है : न्यायालय प्रत्येक मामले में डीएनए परीक्षण का आदेश नहीं देता। केरल उच्च न्यायालय ने कहा है कि केवल संदेह के आधार पर नहीं, बल्कि "दुर्लभ और असाधारण मामलों" में, जब विवाद के समाधान के लिए परीक्षण अपरिहार्य हो, तभी इसका आदेश दिया जाएगा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी कहा है कि प्रथम दृष्टया मजबूत मामला बनने पर ही डीएनए परीक्षण का आदेश दिया जा सकता है।
इंकार का असर : किसी व्यक्ति को जबरन डीएनए परीक्षण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि वह परीक्षण से इनकार करता है तो न्यायालय उसके विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तो यहां तक कहा कि "या तो भरण-पोषण दो या डीएनए परीक्षण कराओ।"
नए कानून का संदर्भ : 1 जुलाई, 2024 से लागू भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 116 के अनुसार वैध विवाह के दौरान जन्मा बच्चा पति का ही माना जाएगा, जब तक कि सुसंगत साक्ष्यों से इसके विपरीत सिद्ध न हो जाए।
इस निर्णय का मतलब:-
पहचान का अधिकार : बच्चा वयस्क होने पर भी अपनी पैतृकता जानने के लिए न्यायालय जा सकता है। न्यायालय ने कहा, "वादी, जो स्वयं बच्चा है, का अपनी पैतृकता जानने का अधिकार है। न्याय के लिए यह आवश्यक है कि सत्य सामने आए।"
भरण-पोषण और अन्य अधिकार : पितृत्व स्पष्ट होने से बच्चे को भरण-पोषण, नाम, संपत्ति तथा अन्य कानूनी अधिकार प्राप्त हो सकते हैं। न्यायालय ने कहा कि भरण-पोषण से इनकार करना बच्चों के बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा।
मिलने का अधिकार भी : दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अन्य मामले में कहा था कि तीन वर्ष से कम आयु के बच्चे को भी "मानित पिता" से मिलने का अधिकार है, क्योंकि माता-पिता दोनों का स्नेह बच्चे के समुचित विकास के लिए आवश्यक है।














