जब खरीददारी हो रही थी तब बड़े साहब की पसंद ही विभाग का संविधान थी। किसी की सलाह की जरूरत नहीं समझी गई।
अब सामान की गुणवत्ता पर सवाल उठे तो जिम्मेदारी नीचे वाले अफसरों के सिर रख दी गई। आखिर बड़े अफसरों की कलम फैसले लिखने के लिए होती है, जवाबदेही लिखने के लिए नहीं।















