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संपादकीय
23 Jul, 2026

न अपील, न दलील, न वकील: अमेरिकी डिपोर्टेशन की जद में 18 हजार भारतीय

अमेरिका की नई डिपोर्टेशन नीति के दायरे में आए 18 हजार भारतीयों के सामने कानूनी सहायता, अपील के अधिकार और भविष्य को लेकर गंभीर अनिश्चितता खड़ी हो गई है।

वाशिंगटन, 23 जुलाई।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता में लौटने के बाद प्रवासियों के खिलाफ सबसे बड़ा अभियान शुरू हो गया है। इस बार निशाने पर वे 18 हजार भारतीय हैं, जिनके पास अमेरिका में रहने के वैध दस्तावेज नहीं हैं। ट्रम्प प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि इन भारतीयों को न अपील का मौका मिलेगा, न दलील रखने की छूट और न ही कानूनी वकील की सहायता। प्रशासन का कहना है कि यह अभियान अमेरिका की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी है, लेकिन मानवाधिकार संगठनों और प्रवासी समुदाय के लिए यह भयावह स्थिति है। अब तक अमेरिका में बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों को भी अपना पक्ष रखने का अधिकार था, लेकिन नई नीति में उस अधिकार को भी समाप्त कर दिया गया है।

ट्रम्प प्रशासन ने डिपोर्टेशन की प्रक्रिया तेज करने के लिए सैन्य विमानों के इस्तेमाल की योजना बनाई है और इसके लिए हजारों करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है। एल पासो और कैलिफोर्निया में बड़े-बड़े वेयरहाउस खरीदे गए हैं, जिन्हें अस्थायी डिटेंशन सेंटर में बदला गया है। इन सेंटरों में 12 हजार से अधिक प्रवासियों को रखा जा सकता है और इन्हें सीधे आईसीई (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट) को सौंपा जा रहा है। आईसीई की टीमें अब दिन-रात छापेमारी कर रही हैं। न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया, टेक्सास और न्यूजर्सी जैसे राज्यों, जहां भारतीय समुदाय की बड़ी आबादी है, वहां डर का माहौल है। दरवाजे की घंटी बजते ही लोगों की धड़कनें बढ़ जाती हैं कि कहीं आईसीई के एजेंट न आ गए हों।

जमीनी हकीकत और भी चिंताजनक है। न्यूयॉर्क में रहने वाले गुरजीत का कहना है कि वे हफ्तों से बच्चों को पार्क नहीं ले गए हैं, क्योंकि बाहर निकलने का मतलब पकड़े जाने का खतरा है। उन्होंने और उनकी पत्नी ने तय किया है कि घर से एक बार में केवल एक ही व्यक्ति बाहर जाएगा, ताकि यदि एक पकड़ा जाए तो दूसरा बच्चों को संभाल सके। टेक्सास की मंदीप कौर हर सुबह घर से निकलने से पहले अपने परिजनों को बताती हैं कि वे कहां जा रही हैं और कब तक लौटेंगी। उनके पास एक वकील का नंबर और जरूरी दस्तावेजों की प्रतियां हमेशा रहती हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि किसी भी समय छापा पड़ सकता है। कैलिफोर्निया के साबिर अली बताते हैं कि पहले व्हाट्सऐप समूहों पर नौकरी और घर की जानकारी मिलती थी, लेकिन अब उन्हीं समूहों में छापेमारी और नाकाबंदी की चेतावनियां आती हैं। हर संदेश डर पैदा करता है और लोग दिनभर मोबाइल देखते रहते हैं।

डिटेंशन सेंटरों के भीतर की स्थिति और भी गंभीर बताई जा रही है। न्यूजर्सी के मोहन का कहना है कि उनके पड़ोसी को आईसीई ने पकड़कर टेक्सास के एक सेंटर में भेज दिया। वहां से आने वाली खबरें डराने वाली हैं। कई दिनों तक सूरज की रोशनी नहीं देखने को मिलती, छोटी-छोटी बातों पर मारपीट होती है और कानूनी मदद मांगने का भी कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि नई नीति के तहत डिपोर्ट किए जाने वाले प्रवासियों को न अपील का अधिकार है और न ही वकील से मिलने की सुविधा। यह व्यवस्था अमेरिका की संघीय प्रणाली और मानवाधिकारों के सिद्धांतों पर भी सवाल खड़े करती है।

अमेरिका में कुल अवैध प्रवासियों की संख्या में भारतीय तीसरे स्थान पर हैं। अनुमान है कि लगभग 7.25 लाख भारतीय अवैध रूप से वहां रह रहे हैं, जिनमें से 18 हजार को डिपोर्टेशन की सूची में रखा गया है। वर्ष 2025 में 3,567 भारतीयों को डिपोर्ट किया गया था और जून 2026 तक यह संख्या 1,076 तक पहुंच चुकी है। अब ट्रम्प प्रशासन इस संख्या को कई गुना बढ़ाने की तैयारी में है। प्रशासन का तर्क है कि अवैध प्रवासियों के कारण अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां प्रभावित हो रही हैं और अपराध बढ़ रहा है, जबकि आलोचकों का कहना है कि यह अभियान चुनावी राजनीति से प्रेरित है और इसका असर उन मेहनती भारतीयों पर पड़ रहा है, जो वर्षों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं।

भारत सरकार के लिए भी यह एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। डिपोर्ट किए जाने वालों में बड़ी संख्या ऐसे परिवारों की है, जिन्होंने बेहतर जीवन की तलाश में वर्षों पहले अमेरिका का रुख किया था। इनमें से कई लोग ट्रैवल एजेंटों और डंकी मार्ग के जरिए अमेरिका पहुंचे थे और अब न वहां सुरक्षित रह पा रहे हैं और न ही सहजता से लौट सकते हैं। भारत सरकार ने अमेरिका से बातचीत कर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि डिपोर्टेशन की प्रक्रिया गरिमापूर्ण हो तथा बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ अमानवीय व्यवहार न हो, लेकिन ट्रम्प प्रशासन की सख्त नीति के कारण कूटनीतिक विकल्प भी सीमित होते दिखाई दे रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सबक यही है कि अवैध प्रवास का सपना अंततः भारी पड़ता है। अमेरिका जैसे देश में कानून का सम्मान करना आवश्यक है और वहां वैध रूप से रहने के लिए नियमों का पालन करना ही एकमात्र रास्ता है। साथ ही, यह भी उतना ही जरूरी है कि किसी भी देश की आव्रजन नीति मानवीय मूल्यों के विरुद्ध न हो। न अपील, न दलील और न वकील की नीति लोकतंत्र और न्याय के मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं कही जा सकती। अमेरिका स्वयं को मानवाधिकारों का सबसे बड़ा पैरोकार मानता है, इसलिए उसकी नीतियों में भी वही आदर्श झलकना चाहिए।

आज 18 हजार भारतीयों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। उनके परिवार भारत और अमेरिका, दोनों जगह चिंता में हैं। दरवाजे की घंटी अब खौफ का प्रतीक बन गई है और हर सुबह यह डर सताता है कि आज किसका नंबर आएगा। भारत और अमेरिका को मिलकर इस समस्या का मानवीय समाधान निकालना होगा, ताकि कानून का राज भी कायम रहे और इंसानियत भी शर्मसार न हो, क्योंकि किसी भी देश की असली ताकत उसकी सख्ती में नहीं, बल्कि उसकी न्यायप्रियता में होती है।

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