भोपाल, 23 जुलाई।
प्रदेश भर में इस बार गर्मी ने जितनी तपिश दिखाई है, उतनी ही मार आम उपभोक्ताओं की जेब पर भी पड़ी है। जनवरी से जून के बीच बिजली की खपत में बेतहाशा वृद्धि हुई और इसके साथ ही लाखों घरेलू उपभोक्ता सब्सिडी के दायरे से बाहर हो गए। आंकड़े बताते हैं कि जनवरी में जहां 2 लाख 17 हजार से अधिक उपभोक्ता सब्सिडी का लाभ ले रहे थे, वहीं जून आते-आते यह संख्या घटकर 1 लाख 25 हजार रह गई। यानी छह महीने में लगभग एक लाख परिवारों की सब्सिडी समाप्त हो गई। यह कोई छोटी बात नहीं है। इसका सीधा असर मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ा है।
समस्या केवल बिजली की खपत बढ़ने की नहीं है। समस्या यह भी है कि बिजली दरों का ढांचा ऐसा है कि थोड़ी-सी अतिरिक्त खपत होते ही उपभोक्ता एक स्लैब से दूसरे स्लैब में पहुंच जाता है और उसका बिल अचानक बढ़ जाता है। 100 यूनिट से 150 यूनिट पर पहुंचने वाले उपभोक्ता का बिल कई गुना बढ़ जाता है, जबकि 150 से 200 यूनिट की खपत होने पर यह राशि दो हजार रुपये तक पहुंच जाती है। जबलपुर, भोपाल, इंदौर, ग्वालियर सहित प्रदेश के अनेक शहरों से शिकायतें मिल रही हैं कि केवल पंखा, कूलर और फ्रिज चलाने पर भी हजारों रुपये का बिल आ रहा है। भीषण गर्मी में एसी और कूलर चलाना मजबूरी बन जाता है, लेकिन इसकी कीमत आम आदमी को भारी बिजली बिल के रूप में चुकानी पड़ रही है।
सरकार का तर्क है कि सीमित संसाधनों के कारण सब्सिडी केवल कम खपत वाले उपभोक्ताओं को दी जा सकती है, जबकि अधिक खपत करने वालों से बाजार दर के अनुसार शुल्क लिया जाना चाहिए। लेकिन यह तर्क जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाता। पिछले पांच वर्षों में बिजली की दरों में कई बार बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ फिक्स चार्ज और अन्य अधिभार भी जुड़े हैं। ऐसे में 150 यूनिट तक की खपत होने पर भी बिल हजार रुपये से कम नहीं आता। इससे साफ है कि सब्सिडी का लाभ कागजों तक सीमित होता जा रहा है और आम उपभोक्ता को अपेक्षित राहत नहीं मिल पा रही है।
इसका सबसे अधिक असर निम्न और मध्यम आय वर्ग पर पड़ा है। एक ओर महंगाई लगातार बढ़ रही है, दूसरी ओर बिजली का बिल परिवार के मासिक खर्च का बड़ा हिस्सा बन गया है। कई परिवारों ने गर्मी के बावजूद कूलर और पंखे का उपयोग कम कर दिया है ताकि बिजली बिल नियंत्रित रहे। स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि भीषण गर्मी में ऐसा करना हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है। यानी महंगी बिजली का असर केवल जेब पर ही नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।
प्रदेश सरकार को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा। केवल आंकड़े जारी करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जिन लाखों उपभोक्ताओं की सब्सिडी समाप्त हुई है, उनके लिए राहत के उपाय किए जाने चाहिए। सब्सिडी की सीमा बढ़ाने, स्लैब व्यवस्था की समीक्षा करने और बिजली वितरण कंपनियों की कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। साथ ही लाइन लॉस कम करने और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, विशेषकर सौर ऊर्जा, को बढ़ावा देने पर भी ध्यान देना होगा।
बिजली आज केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की मूलभूत आवश्यकता बन चुकी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और उद्योग—सभी बिजली पर निर्भर हैं। यदि बिजली का बढ़ता खर्च आम आदमी की पहुंच से बाहर होता गया, तो विकास के दावों का लाभ समाज के बड़े वर्ग तक नहीं पहुंच पाएगा। इसलिए समय की मांग है कि सरकार इस समस्या का व्यावहारिक समाधान निकाले और आम उपभोक्ता को राहत दिलाने के लिए प्रभावी कदम उठाए।










