चित्रकूट, 23 जुलाई।
चित्रकूट को प्रभु श्रीराम की तपोभूमि के रूप में विश्वभर में मान्यता प्राप्त है, लेकिन विडंबना यह है कि यहां विकास कार्य कछुआ गति से चल रहे हैं। कामदगिरि परिक्रमा पथ और मंदाकिनी घाटों के निर्माण की धीमी रफ्तार ने श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों का धैर्य तोड़ दिया है। एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद परिक्रमा पथ के ढाई किलोमीटर हिस्से का कार्य भी पूरा नहीं हो सका है।
निर्माण स्थल पर जगह-जगह बालू, सीमेंट और गिट्टी के ढेर लगे होने से श्रद्धालुओं को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। उबड़-खाबड़ और फिसलन भरे मार्ग के कारण कई बुजुर्ग और महिलाएं चोटिल हो चुके हैं। यह केवल निर्माण में देरी का मामला नहीं, बल्कि आस्था से जुड़े स्थान पर गंभीर लापरवाही का उदाहरण है।
स्थिति यह है कि जब भी प्राधिकरण के अध्यक्ष या कलेक्टर समीक्षा बैठक के लिए आते हैं, तब एक दिन पहले निर्माण कार्य में तेजी दिखाई देती है। बैठक समाप्त होते ही काम फिर ठप पड़ जाता है। यही कारण है कि चित्रकूट की कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं वर्षों से अधूरी पड़ी हैं। सीवर लाइन परियोजना इसका प्रमुख उदाहरण है।
समस्या की जड़ जवाबदेही का अभाव है। ठेकेदारों पर समयसीमा का पालन कराने और अधिकारियों की नियमित निगरानी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। निर्माण सामग्री को रास्ते से हटाकर श्रद्धालुओं के लिए वैकल्पिक मार्ग बनाया जाना चाहिए तथा देरी होने पर आर्थिक दंड और ब्लैकलिस्टिंग जैसी सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
चित्रकूट केवल एक नगर नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। रामपथगमन जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को समयबद्ध ढंग से पूरा करना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। विकास की यह कछुआ चाल अब तेज गति में बदलनी ही होगी, ताकि श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास दोनों सुरक्षित रह सकें।










