नई दिल्ली, 23 जुलाई।
नीट-यूजी 2026 परीक्षा में अनियमितताओं के आरोपों के बाद देशभर में उठी चिंता स्वाभाविक थी। करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े इस मामले में सरकार ने परीक्षा रद्द करने, पुनर्परीक्षा कराने और उसके परिणाम घोषित करने जैसे कठिन लेकिन आवश्यक निर्णय लिए। जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं, दोषियों पर कार्रवाई शुरू हुई और परीक्षा प्रणाली की कमियों को दूर करने की प्रक्रिया भी तेज हुई। यह संदेश स्पष्ट है कि यदि कहीं गड़बड़ी हुई है तो उसे छिपाने के बजाय सुधारना ही सरकार की प्राथमिकता है।
इसी मुद्दे को लेकर दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और उसके समर्थकों ने संसद तक मार्च निकालने का आह्वान किया। शिक्षा सुधार की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार कानून और व्यवस्था की सीमाओं के भीतर ही सुरक्षित रहता है। आज जब संसद का मानसून सत्र प्रारंभ हुआ, तब देश के कोने-कोने से चुने हुए जनप्रतिनिधि संसद पहुंचे। संसद केवल एक भवन नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक संप्रभुता का सर्वोच्च प्रतीक है। उसकी सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता न सरकार कर सकती है और न ही उसे करना चाहिए।
दिल्ली पुलिस ने पहले से निषेधाज्ञा लागू कर स्पष्ट किया था कि संसद की ओर मार्च की अनुमति नहीं होगी। इसके बावजूद बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ने का प्रयास करते रहे। ऐसे में पुलिस के सामने दो ही विकल्प थे—या तो कानून का पालन कराए अथवा भीड़ को संसद क्षेत्र तक पहुंचने दे। किसी भी जिम्मेदार सरकार के लिए दूसरा विकल्प स्वीकार्य नहीं हो सकता था। भीड़ कितनी भी सदाशयी क्यों न हो, यदि उसका कोई स्पष्ट और उत्तरदायी नेतृत्व न हो, तो कुछ शरारती तत्व पूरे आंदोलन को अराजकता में बदल सकते हैं। ऐसी आशंका को नज़रअंदाज़ करना राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ जोखिम उठाने जैसा होता।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि झड़पों में छात्र, पुलिसकर्मी और कुछ पत्रकार भी घायल हुए। किसी भी लोकतंत्र में ऐसी स्थिति सुखद नहीं कही जा सकती। लेकिन इसका संपूर्ण उत्तरदायित्व केवल पुलिस पर डाल देना भी न्यायसंगत नहीं होगा। कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का संवैधानिक दायित्व है, और जब बार-बार चेतावनी के बाद भी प्रतिबंधित क्षेत्र की ओर बढ़ने का प्रयास हो, तब बल प्रयोग अंतिम विकल्प बन जाता है। यदि पुलिस मूकदर्शक बनी रहती और संसद की सुरक्षा में सेंध लग जाती, तो उसी पुलिस और सरकार पर कर्तव्यहीनता का आरोप लगता।
यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने संवाद के द्वार पूरी तरह बंद नहीं किए। आंदोलन के प्रतिनिधियों से बातचीत की पहल की गई और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांगों पर चर्चा का संकेत भी दिया गया।
भारत का लोकतंत्र विरोध की आवाज़ का सम्मान करता है, लेकिन लोकतंत्र की सफलता का आधार अनुशासन भी है। छात्रों का भविष्य नारे और टकराव से नहीं, बल्कि मजबूत परीक्षा प्रणाली, पारदर्शी संस्थाओं और रचनात्मक संवाद से सुरक्षित होगा। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह शिक्षा व्यवस्था को और अधिक विश्वसनीय बनाए, वहीं युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें।
राष्ट्रहित में यही संतुलन सबसे आवश्यक है—सुधार भी हो, संवाद भी हो, लेकिन संसद की गरिमा, कानून का राज और राष्ट्रीय संस्थाओं की सुरक्षा किसी भी कीमत पर कमजोर न पड़ने पाए। यही एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।










