नई दिल्ली, 23 जुलाई।
भारत ऊर्जा आत्मनिर्भरता और स्वच्छ भविष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के बढ़ते उपयोग के साथ लिथियम-आयन बैटरियों की मांग अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई है। इसके साथ ही एक बड़ी चुनौती भी सामने आई है—उपयोग के बाद बैटरियों का सुरक्षित निपटान और उनमें मौजूद कीमती धातुओं का पुनः उपयोग। लंबे समय तक यह माना जाता था कि लिथियम का रीसाइक्लिंग कठिन है, लेकिन नई तकनीकों ने यह धारणा बदल दी है। आज लिथियम बैटरियां कचरा नहीं, बल्कि भविष्य का खजाना मानी जा रही हैं, क्योंकि इनमें मौजूद लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और अन्य धातुओं को निकालकर दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है। यह प्रक्रिया न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक है, बल्कि भारत को विदेशी आयात पर निर्भरता कम करने का अवसर भी देती है।
विश्वभर में लिथियम की मांग लगातार बढ़ रही है, क्योंकि स्मार्टफोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहन और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में लिथियम-आयन बैटरियां अनिवार्य हो चुकी हैं। भारत में भी इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश हो रहा है, जबकि लिथियम का अधिकांश भंडार देश में उपलब्ध नहीं है। ऐसे में आयात पर निर्भरता बढ़ती है और विदेशी मुद्रा का बड़ा व्यय होता है। यदि उपयोग की जा चुकी बैटरियों से लिथियम और अन्य धातुओं को पुनः प्राप्त किया जाए तो नई बैटरियों के निर्माण में उनका उपयोग संभव होगा और आयात का बोझ कम किया जा सकेगा।
लिथियम बैटरियों के रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया जटिल अवश्य है, लेकिन अब पूरी तरह संभव हो चुकी है। पहले इसे खर्चीला और कठिन माना जाता था, इसलिए अधिकांश बैटरियां कचरे में फेंक दी जाती थीं। अब आधुनिक रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसी धातुओं को अलग कर शुद्ध किया जा रहा है और फिर बैटरी निर्माण में दोबारा उपयोग किया जा रहा है। इस प्रक्रिया को 'अर्बन माइनिंग' भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें कचरे से बहुमूल्य धातुओं का निष्कर्षण किया जाता है। भारत में कई स्टार्टअप और बड़ी कंपनियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं और सरकार भी इसे बढ़ावा दे रही है।
रीसाइक्लिंग का सबसे बड़ा लाभ पर्यावरण संरक्षण है। यदि पुरानी बैटरियों को खुले में फेंक दिया जाए तो उनमें मौजूद रसायन मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकते हैं। लिथियम के अलावा कोबाल्ट, निकेल और मैंगनीज जैसे तत्व भी पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं। रीसाइक्लिंग से न केवल प्रदूषण कम होगा, बल्कि नई धातुओं के खनन की आवश्यकता भी घटेगी। खनन महंगा होने के साथ-साथ पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाता है, इसलिए रीसाइक्लिंग अधिक टिकाऊ विकल्प है।
भारत के लिए इसका आर्थिक महत्व भी कम नहीं है। आने वाले वर्षों में देश में बड़ी संख्या में इलेक्ट्रिक वाहन होंगे और उनकी बैटरियों का जीवन सामान्यतः पांच से सात वर्ष होता है। इसके बाद बड़ी मात्रा में बैटरियां रीसाइक्लिंग के लिए उपलब्ध होंगी। यदि इनका वैज्ञानिक तरीके से पुनर्चक्रण किया जाए तो अरबों रुपये मूल्य की धातुएं प्राप्त की जा सकती हैं। इससे नया उद्योग विकसित होगा, रोजगार बढ़ेंगे और विदेशी मुद्रा की बचत होगी। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
सरकार ने भी इस दिशा में पहल की है। बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के तहत निर्माताओं और आयातकों को उपयोग के बाद बैटरियां वापस लेने और उनके सुरक्षित निपटान की जिम्मेदारी दी गई है। इलेक्ट्रिक वाहन नीति में भी रीसाइक्लिंग को प्राथमिकता मिली है तथा अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। हालांकि, अभी भी उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी, अनौपचारिक क्षेत्र में असुरक्षित तरीके से बैटरियां तोड़ने की प्रवृत्ति और आधुनिक रीसाइक्लिंग संयंत्रों की सीमित संख्या जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। इनसे निपटने के लिए सरकार और निजी क्षेत्र को मिलकर काम करना होगा।
यदि भारत लिथियम बैटरी रीसाइक्लिंग के क्षेत्र में अग्रणी बनता है तो वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को अधिक सुरक्षित बनाने के साथ वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह एक ऐसी गोलाकार अर्थव्यवस्था की दिशा में कदम होगा, जहां कचरा भी मूल्यवान संसाधन बन जाएगा। इसके लिए शिक्षा, उद्योग और नीति—तीनों स्तरों पर समन्वित प्रयास जरूरी हैं। लिथियम बैटरियों का रीसाइक्लिंग केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक जरूरत भी है। समय की मांग है कि इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए, ताकि ऊर्जा आत्मनिर्भरता, प्रदूषण नियंत्रण और रोजगार सृजन के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ और समृद्ध भारत का निर्माण सुनिश्चित किया जा सके।











