भोपाल, 23 जुलाई।
स्वास्थ्य सेवा किसी भी सभ्य समाज की सबसे बड़ी प्राथमिकता मानी जाती है, क्योंकि यह सीधे आमजन के जीवन और मृत्यु से जुड़ी होती है। जब इसी पवित्र क्षेत्र में फर्जीवाड़ा पनपने लगे और फर्जी डिग्रीधारी लोग सरकारी नियमों को धता बताकर सरकारी योजनाओं में नियुक्ति प्राप्त कर लें, तो समझा जा सकता है कि व्यवस्था कितनी खोखली हो चुकी है। प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में फर्जी डॉक्टरों और फर्जी नियुक्तियों के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, जो न केवल सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि मरीजों के जीवन से भी खिलवाड़ कर रहे हैं।
हाल का मामला विभागीय लापरवाही का बड़ा उदाहरण है, जिसमें एक व्यक्ति ने तीन अलग-अलग जिलों में अलग कर्मचारी आईडी, अलग पैन नंबर और अन्य दस्तावेजों के आधार पर नौकरी की तथा सरकारी खजाने से लाखों रुपये वेतन के रूप में प्राप्त किए। प्रारंभिक आकलन के अनुसार सरकार को लगभग 64 लाख रुपये की आर्थिक क्षति हुई। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इतने बड़े फर्जीवाड़े के बावजूद विभाग की जांच प्रणाली वर्षों तक इसे पकड़ नहीं सकी। न ऑनलाइन प्रणाली में कोई गड़बड़ी सामने आई और न ही जिला या राज्य स्तर पर किसी अधिकारी को संदेह हुआ। यह स्पष्ट करता है कि स्वास्थ्य विभाग में दस्तावेजों के सत्यापन और क्रॉस वेरिफिकेशन की प्रभावी व्यवस्था नहीं है।
चिंता की बात यह भी है कि फर्जी डॉक्टर केवल वेतन ही नहीं ले रहा था, बल्कि मरीजों का उपचार भी कर रहा था। बिना वैध चिकित्सा डिग्री वाला व्यक्ति यदि दवा लिखे, इंजेक्शन लगाए या गंभीर बीमारियों का इलाज करे, तो उसके दुष्परिणाम घातक हो सकते हैं। गलत निदान या गलत दवा किसी की जान भी ले सकती है। इसलिए यह केवल आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि गंभीर आपराधिक कृत्य है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि नियुक्ति के समय दस्तावेजों का सत्यापन, पुलिस वेरिफिकेशन और मेडिकल डिग्री की प्रमाणिकता की जांच कैसे नहीं हुई। यदि सभी प्रक्रियाएं पूरी हुई थीं, तो यह व्यक्ति तीन स्थानों पर नौकरी कैसे करता रहा? स्पष्ट है कि प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं या फिर कहीं न कहीं मिलीभगत रही है। संविदा और एनएचएम की नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव लंबे समय से चिंता का विषय रहा है।
स्वास्थ्य मंत्री ने मामले में सख्त कार्रवाई के संकेत दिए हैं। आरोपी की सेवा समाप्त करने, वेतन की वसूली और एफआईआर दर्ज कराने की बात कही गई है। यह स्वागत योग्य कदम है, लेकिन केवल एक मामले में कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। आवश्यकता है कि पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग और एनएचएम के अंतर्गत कार्यरत सभी कर्मचारियों के दस्तावेजों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए तथा उनकी डिग्री, पहचान पत्र और अन्य अभिलेखों का केंद्रीय स्तर पर सत्यापन किया जाए।
जब तक अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, ऐसे मामले रुकने वाले नहीं हैं। प्रत्येक जिले के जिम्मेदार अधिकारियों को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के दस्तावेजों की सत्यता सुनिश्चित करनी होगी। नियुक्ति प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, ताकि मानवीय हस्तक्षेप और फर्जीवाड़े की गुंजाइश समाप्त हो सके। स्वास्थ्य सेवाओं में फर्जीवाड़ा सीधे जनता के जीवन से जुड़ा अपराध है। अब समय आ गया है कि सरकार इसे एक अकेला मामला न मानकर पूरे तंत्र की व्यापक समीक्षा करे, ताकि जनता का भरोसा स्वास्थ्य व्यवस्था पर बना रहे।










