नई दिल्ली, 23 जुलाई।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, न्यायमूर्ति एम.एम. सुन्दरेश एवं न्यायमूर्ति पी.बी. वराले ने लियाकत अली बनाम स्टेट ऑफ जम्मू मामले में निर्णय दिया है कि यदि ट्रायल में लंबी देरी हो रही है तो आरोपी जमानत का हकदार हो सकता है। पीठ ने कहा कि—
शीघ्र सुनवाई मौलिक अधिकार है हर आरोपी का मौलिक अधिकार है कि उसके मामले का ट्रायल शीघ्र पूरा हो, चाहे अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो। लंबे समय तक जेल में रहना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त शीघ्र न्याय के अधिकार का उल्लंघन है।
न्यायालय और अभियोजन की जिम्मेदारी यदि ट्रायल अत्यधिक धीमी गति से चल रहा है तो आरोपी जमानत का अधिकारी हो सकता है। एक मामले में न्यायालय ने कहा कि, "जिस प्रकार अभियोजन एजेंसी और ट्रायल कोर्ट ने कार्यवाही की है, उससे आरोपी के शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हुआ है।" इसलिए, जब आरोपी जेल में हो, तब न्यायालय और अभियोजन दोनों की जिम्मेदारी है कि कार्यवाही में अनावश्यक देरी न हो।
देरी का बहाना नहीं चलेगा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता कि "मुकदमे में तेजी लाई जाएगी।" भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 251(बी) के अनुसार सत्र न्यायालय के मामलों में पहली सुनवाई से 60 दिनों के भीतर आरोप तय किए जाने चाहिए, लेकिन इसका पालन नहीं हो रहा है। इसी कारण न्यायालय ने पूरे देश के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की आवश्यकता भी जताई।
जेल से पेशी कराना पुलिस का दायित्व पीठ ने कहा कि यदि आरोपी जेल में है तो उसे ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश करना पुलिस अधिकारियों का कर्तव्य है। पुलिस की लापरवाही का खामियाजा आरोपी को नहीं भुगतना चाहिए।
लंबी विचाराधीन कैद, सजा के समान पीठ ने कहा कि यदि किसी विचाराधीन कैदी को लंबे समय तक हिरासत में रखा जाए और ट्रायल आगे न बढ़े, तो ऐसी हिरासत व्यावहारिक रूप से सजा का रूप ले लेती है। छह-सात वर्ष तक जेल में रहने के बाद निर्णय आना शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा।
याचिका के तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 382, 201 एवं 34 के तहत दर्ज मामले में नौ वर्ष से जेल में था। घटना के समय वह किशोर था। ट्रायल धीमी गति से चलने के कारण उसने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में जमानत याचिका दायर की, जिसे स्वीकार कर लिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल में लगातार देरी और लंबी विचाराधीन कैद हमारी न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर देती है।
संक्षेप में: आरोपी के जेल में रहते हुए शीघ्र सुनवाई केवल उसकी मांग नहीं, बल्कि न्यायालय और अभियोजन की संवैधानिक जिम्मेदारी है। यदि इसमें अनुचित देरी होती है तो जमानत मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है।










