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04 Aug, 2026

भारत की पहली स्वदेशी अफ्रीकी स्वाइन फीवर वैक्सीन राष्ट्र को समर्पित

आईसीएआर द्वारा विकसित अफ्रीकी स्वाइन फीवर की भारत की पहली स्वदेशी वैक्सीन को केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राष्ट्र को समर्पित किया, जिससे पशुपालकों और जैव सुरक्षा को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।

नई दिल्ली, 04 अगस्त।

देश के पशुपालन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने अफ्रीकी स्वाइन फीवर (एएसएफ) के खिलाफ भारत की पहली स्वदेशी वैक्सीन विकसित की है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को आईसीएआर के स्थापना दिवस समारोह में इस वैक्सीन को राष्ट्र को समर्पित किया। कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह भी उपस्थित रहे।

अफ्रीकी स्वाइन फीवर सूअरों में फैलने वाला अत्यंत घातक वायरल रोग है, जिसमें मृत्यु दर 100 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। भारत में यह बीमारी पहली बार वर्ष 2020 में सामने आई थी। इसके बाद विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों में बड़ी संख्या में सूअरों की मौत हुई और हजारों पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।

आईसीएआर के अनुसार वर्ष 2020 और 2021 के दौरान असम में इस बीमारी के कारण सूअरों की मौत और उन्हें नष्ट किए जाने से लगभग 276 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। वहीं मिजोरम में वर्ष 2025 तक 11,382 से अधिक परिवार प्रभावित हुए और करीब 982 करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति दर्ज की गई। इन परिस्थितियों ने इस बीमारी के लिए प्रभावी स्वदेशी समाधान की आवश्यकता को रेखांकित किया।

आईसीएआर के अधिकारियों ने बताया कि राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान, भोपाल के वैज्ञानिकों ने एमए-104 सेल लाइन आधारित लाइव एटेन्यूएटेड एएसएफ वैक्सीन विकसित की है। यह वैक्सीन बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए उपयुक्त है और इसके निर्माण की लागत भी अपेक्षाकृत कम होगी।

वैक्सीन के सुरक्षा, प्रभावशीलता, आनुवंशिक स्थिरता और फील्ड ट्रायल सहित सभी आवश्यक परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं। इसे आठ सप्ताह से अधिक आयु के स्वस्थ सूअरों को एक मिलीलीटर की खुराक के रूप में दिया जाएगा तथा 14 दिन बाद बूस्टर डोज़ लगाई जाएगी।

आईसीएआर का कहना है कि इस स्वदेशी वैक्सीन से सूअरों की मृत्यु दर कम होगी, पशुपालकों की आर्थिक हानि घटेगी और देश की जैव सुरक्षा को मजबूती मिलेगी। साथ ही भारत कम लागत वाली एएसएफ वैक्सीन के वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में भी उभर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह उपलब्धि पशु स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

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